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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 239 of 415

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Page 239

सौंदर्य लहरी १८२
भास्करराय विरचित वरिवास्यारहस्य में बिन्दु, अर्धचन्द्रिका
रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, और उन्मनी इन नौ
स्तरों की समष्टि को नाद संज्ञा दी गई है ।
विन्द्वादीनां नवानां तु समष्टिर्नाद उच्यते । (१.३) ।
अर्थात् हृल्लेखा के उच्चारण होने पर अनुनासिक ध्वनि उक्त नौ
स्तरों से होती हुई उन्मनी में समाप्त होती है, जिसके काल की
मात्रा उत्तरोत्तर आधी होती जाती है और सबके योग का काल
१/२ मात्रा होता है। जो बिन्दु की आधी मात्रा सहित पूरी १ मात्रा
बनाती है । अर्थात्
१/२ + १/४ + १/८ + १/१६ + १/३२ + १/६४ + १/१२८ = + १/२५६ + १/२५६ = १
पंचदशी के ३ अनुस्वार तीन विन्दु हैं, हृल्लेखा नाद, और
१५ अक्षर १५ कला । नाद विन्दु और कला तीनों को भी त्रिविन्दु
कह सकते हैं । श्री चक्र को भी नाद विन्दु कला भेद से त्रिधा
माना जाता है ।
नाद से विन्दु, विन्दु से कला, नाद से कला, कला से विन्दु
और कला से नाद का पांच प्रकार का ऐक्य संबंध जानने से
अन्तर्याग की सिद्धि होती है ।
ब्रह्म को विन्दु, शक्ति को कला और जीव को नाद समझकर
उक्त पांच प्रकार का संबंध स्थापित होता है । प्रथम में जीव
ब्रह्मैक्य भाव है, दूसरे में ब्रह्म से सृष्टि का प्रभव, तीसरे से देहा-