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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 237

सौंदर्य लहरी १८७
दूसरे प्रकार की भावना में विशुद्ध चक्र के १६ पत्नों पर पूर्व से
अग्नि, दक्षिण, नैऋत, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और ईशान क्रमानुसार
१६ अक्षरों की भावना की जाती है. जो चन्द्रमा की कलाओं के
सदृश चमकती हैं और सहस्रार की पूर्ण कला के बिंब से आज्ञाचक्र
पर होती हुई नीचे के विशुद्धचक्र पर प्रतिबिंबित होती हैं। इस प्रकार
चितिशक्ति का सम्बन्ध १६ नित्याकलाओं से, उनका संवन्ध मन्त्र से,
मन्त्र का संवन्ध सुषुम्ना से, सुषुम्ना का मातृका से, मातृका का
संबन्ध ईड़ा पिंगला से, और तत्सम्बन्धी सूर्याग्निचन्द्र से और सबका
श्रीचक्र से, जो देह (पिण्ड) और विराट् देह (ब्रह्माण्ड) दोनों का
प्रतीक है, सबका पारस्परिक सम्बन्ध समझना चाहिये ।
सबका उपरोक्त पारस्परिक सम्बन्ध जानने के साथ नाद विन्दु
नाद, विन्दु और और कला का अर्थ और उनका मन्त्र, यंत्र और
कला देहस्थ चक्रों से सम्बन्ध भी समझना आवश्यक
है और यह जानना आवश्यक है कि इन
तीनों का पारस्परिक सम्बन्ध क्या है ।
बिन्दुः शिवात्मको बीजं शक्ति र्नादस्तयोर्मितः ।
समवायः समाख्यातः सर्वागम विशारदैः ॥
सच्चिदानन्द विभवात् संकलात्परमेश्वरात् ।
आसीच्छक्तिस्ततो नादा नादाद्विन्दु समुद्भवः ॥
पर शक्तिमयः साक्षात् त्रिधासौ भिद्यते पुनः ।
विन्दुनादो बीजमिति तस्यभेदाः समीरिंताः ॥
रौद्री विन्दोस्ततो नादाज्ज्येष्ठा बीजादजायत ।
वामा ताभ्यः समुत्पन्नाः रुद्रब्रह्मारमाधिपाः ॥