सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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माला के लिये प्रवाल, मोती, स्फटिक, शंख, सोना, चांदी, चन्दन,
पुत्र जीविक (जीयापोता), कमलगट्ठा, और रुद्राक्ष में से किसी प्रकार
के मणिके लिये जा सकते हैं। माला को गंध और पंचगव्य से
स्नान कराकर अष्टगंध से लेपकर, अक्षत् पुष्पादि से पूजन करके,
अ से क्ष पर्यन्त चिन्तामणियोँ की उक्त उपनिषदुक्त मंत्रों से भावना-
युक्त प्रतिष्ठा करनी चाहिये। देखें अक्षमालोपनिषद् ।
श्लोक ११ की व्याख्या में श्री चक्र का रहस्य समझाया जा चुका
\ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ है। मंत्र का यंत्र से संबंध है पहिले मंत्र का
षोडशी \ \ \ \ \ \ स्वरूप समझना आवश्यक है, फिर मंत्र, यंत्र
विज्ञान \ \ \ \ \ \ (श्री चक्र), षट् चक्र, मातृका और ब्रह्माण्ड
पिण्ड का पारस्परिक संबंध समझा जा सकेगा।
मंत्र के तीन कूट हैं और १५ अक्षर हैं, सोलहवां अक्षर
गुरुमुख से लेकर वह ही मंत्र षोडशी मंत्र बन जाता है। प्रथम
*वाग्भव कूट अग्नेय भगवती का मुख है। दूसरा काम कला कूट सूर्य से
संबंध रखता है, वह शक्ति का कण्ठ से नीचे कटि पर्यन्त रूप है।
दोनों के बीच में हृल्लेखा ब्रह्म ग्रंथि है। तीसरा शक्ति कूट चन्द्र से
संबंधित कटिके नीचे का भाग है, वह सर्जन शक्ति का रूप है।
दूसरे और तीसरे कूट के बीच की हृल्लेखा विष्णु ग्रंथि है।
*श्रीमद्वाग्भव कूटैकस्वरूप मुखपंकजा ।
कण्ठाधः कटिपर्यन्त मध्यकूट स्वरूपिणी ॥
शक्तिकूटैकतापन्नकट्यधोभाग धारिणी ।
मूलमंत्रात्मिका मूलकूटत्रयकलेवरा ॥
ललिता सहस्रनाम (८५, ८६, ८७,)