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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 229 of 415

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Page 229

सौंदर्य लहरी १७९
मननात् प्राणनाच्चैव मद्रूपस्यावबोधनात् ।
मंत्रमित्युच्यते ब्रह्मन् मदधिष्ठानतोऽपिवा ॥ यो०शि०(२,७)
शिवजी ब्रह्माजी से कहते हैं कि मनन किये जाने के कारण,
प्राणों का उत्थान करने के कारण, मेरे रूप का ज्ञान उत्पन्न करने के
कारण अथवा मेरा अधिष्ठान होने के कारण मंत्र मंत्र कहलाता है ।
मंत्र के जप से कुण्डलिनि शक्ति का जागरण होता है, शक्ति
के जागरण से आत्मज्ञान का उदय होता है, इसलिये मंत्र को
देवता का अधिष्ठान कहा गया है । शक्ति दीक्षा से शक्ति का
जागरण होने पर मंत्रयोग, लययोग, हठयोग और राजयोग चारों का
विकास होता देखा जाता है । इसलिये शक्ति जागरण को ही
महायोग कहते हैं ।
मंत्रो लयोहठो राजयोगोऽन्तर्भूमिकाः क्रमात् ।
एक एव चतुर्धायं महायोगोऽभिधीयते ॥ यो०शि० (१,१२९)
मंत्र के प्राप्त करने पर उक्त चारों भूमिकाएं उदय होती हैं ।
आणवी दीक्षा में मंत्र का उपदेश करके शिष्य को श्रीचक्र पर
भगवती की सपर्यापद्धति के अनुसार पूजन विधि बताई जाती है ।
शक्ति दीक्षा में गुरु शिष्य के सिर पर स्पर्श करके शक्ति जागृत
करता है । तीसरी शांभवी दीक्षा में ब्रह्मात्मैक्य भाव में शिष्य को
ले जाया जाकर उसको महावाक्यों का उपदेश दिया जाता है ।
इस विषय के सम्बन्ध में श्री विद्या पर लिखित नित्योत्सव ग्रंथ में
दीक्षा प्रकरण देखें ।