सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी १७७
उपासना में ऋषि, छंद, देवता विनियोग इत्यादि की आवश्यकता
रहती है, परन्तु अन्तर्याग में केवल आत्म तत्व पर ही लक्ष्य रहता है ।
देखें भास्कर राय का वरिवस्यारहस्य ।
त्रिपुरोपनिषद् में दोनों विद्याओं का संकेत निम्न श्रुतियों
द्वारा किया गया है। वहां दोनों का क्रम सौन्दर्य लहरी के क्रम से
विपरीत है, वहां पहिले कादि मूल विद्या बताकर उससे लोपा मुद्रा का
निर्माण किया गया है, यहां लोपा मुद्रा पहिले कहकर उससे मूल
विद्या का निर्माण किया गया है।
कादि मूल विद्या को बताने वाली श्रुति यह है: —
कामोयोनिः कामकला वज्रपाणिर्गुहाहसा मातरिश्वाअमिन्द्रः ।
पुनर्गुहा सकला मायया च पुरुच्येषा विश्वमाताऽऽदि विद्या ॥ (८)
और लोपा मुद्रा (हादि विद्या) का इससे निर्माण करने के
लिये नीचे वाली श्रुति है।
षष्ठ सप्तममथ बहिसारथिमस्या मूलत्रिकमादेशयन्तः । (९)
अर्थ देखें परिशिष्ठ (२)
दोनों श्लोकों में पञ्चदशी के दोनों रूप हैं। दूसरे श्लोक में
'एके' पद के प्रयोग से, जिससे अन्य मतावलंबी साधक जन
अभिप्रेत हैं, यह प्रतीत होता है कि श्री शंकर भगवत्पाद स्वयं
प्रथम श्लोक में बताये हुए मंत्र के उपासक थे । और यह ही बात