सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी १७५
सिद्ध योगेश्वरी मत (३) कुरुपिका मत, (४) देवरूपिका मत,
(५) सर्ववीर मत, (६) विमला मत, (७) ज्ञानार्णव और (८)
वीरावलि ।
हादि और कादि विद्याओं के रूप
[ ३२ ]
शिवः शक्तिः कामः क्षितिरथ रविः शीतकिरणः
स्मरो हंसः शक्रस्तदनु च परामारहरयः ।
अमी हृल्लेखाभिस्तिसृभिरवसानेषु घटिता
भजन्ते वर्णास्ते तव जननि नामावयवताम् ॥
[ ३३ ]
स्मरं योनिं लक्ष्मीं त्रितयमिदमादौ तव मनो-
र्निधायैके नित्ये निरवधिमहाभोगरसिकाः ।
(जपंति) भजंति त्वां चिन्तामणिगुणनिबद्धाक्षव (र) लयाः
शिवाऽग्नौ जुह्वन्तः सुरभिघृतधाराऽऽहुतिशतैः ॥
अर्थ—हे जननि ! शिव, शक्ति, काम, क्षिति और फिर
रवि, शीतकिरण (चन्द्र), स्मर (काम), हंस, शक्र, इसके पीछे परा
(शक्ति), मार (काम), हरि, इन तीनों के अन्त में ३ हृल्लेखा
जोडकर तेरे नाम के अवयव स्वरुप अक्षरों का साधक जन
भजन करते हैं । (३२)