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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 195 of 415

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Page 195

सौंदर्य लहरी १४५
में मलविसर्जन का कार्य करती है। पंच प्राणों की क्रियायें
इसही नाडी से संबंध रखने वाली क्रियायें है। जो मन के
आधीन नहीं हैं और सोते जागते सदा अपना कार्य किया
करती हैं। क्योंकि प्राण कभी सोता नहीं, मन सोता जागता
है। इस दक्षिण वैगस नाडी का संबंध सुषुम्ना के दक्षिण पार्श्व की
पिंगला से है, ईडा से नहीं है। इसलिये चन्द्रमा का संबंध ईडा से,
सूर्य का संबंध पिंगला से रहता है और ईडा को चन्द्र नाडी और
पिंगला को सूर्य नाडी कहते हैं।
सूर्य की किरणों में प्रकाश, उष्णता और प्राण शक्ति अर्थात्
जीवन प्रद शक्ति की त्रिधा शक्ति होती है। उनमें उष्णता विष
का कार्य करती है, परन्तु विष भी अल्प मात्रा में अमृत का कार्य
करता है, इसलिये सूर्य की उष्णता एक परिमित ताप मान की अवधि
में जीवन की रक्षा के लिये सहायक होती है और उस अवधि के
बाहर मारक सिद्ध हो जाती है। चन्द्रमा सूर्य की उष्णता को स्वयं पान
कर लेता है और प्रकाश और प्राण शक्ति को अमृत के रूप में भूमि
पर अपनी कलाओं द्वारा बरसाया करता है। यह बाह्य क्रिया प्राणि
मात्र के शरीर पर ईडा और पिंगला नाडियों द्वारा प्रभाव डालती है।
शुक्ल पक्ष में अमृत की वृद्धि होती है और कृष्ण पक्ष में कमी।
साधारण प्राणियों में अमृत का संचय नहीं होने पाता, अधोमुख
अनाहत चक्र अपनी उष्णता से सब अमृत को सुखाता रहता है।
इसलिये उसको विष की वर्षा करने वाला माना गया है।
कुण्डलिनी के जागने पर उसके उद्ध्व मुख होने पर उसकी क्रिया