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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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सौंदर्य लहरी ११७
का योग हो जाता है। सब किरणों को सुषुम्ना पथ में, कार्य को
कारण में लीन करते हुए, भगवती के चरणों तक पहुंचा जाता है,
अर्थात् आज्ञा चक्र के ऊपर जाया जाता है। जैसा कि श्लोक में
कहा है कि भगवती के दोनों चरण सब किरणों का अतिक्रमण कर
के सब के ऊपर स्थित हैं।
किरणों का संबंध तत्वों से, वर्ण माला से और उनके अधि-
ष्ठातृ शक्तियों से त्रिविध जानना चाहिये।
पृथिवी की ५६ किरणें:— ५ महाभूत, ५ तन्मात्रा, ५
किरणों का तत्वों कर्मेन्द्रियां ५ ज्ञानेन्द्रियां, ४ अन्तःकरण चतुष्टय,
से सम्बन्ध कला, प्रकृति, महत्, ओर पुरुष । इनका योग
२८ है और शिव शक्ति भेद से ५६ ।
जल किरणें:— ५ महाभूत, १० इन्द्रियां, १० उनके कार्य
और मन । इनका योग २६ है और शिव शक्ति भेद से ५२ ।
अग्नि की किरणें: — ५ महाभूत, ५ तन्मात्रायें, १० इन्द्रियां,
१० उनके कार्य और मन, सब का योग ३१ है, शिव शक्ति
भेद से ६२ ।
वायु की किरणें: — ५ महाभूत, ५ तन्मात्रा, ५ कर्मेन्द्रियां,
५ ज्ञानेन्द्रियां, ४ अन्तःकरण चतुष्टय, कला, प्रकृति और पुरुष ।
इनका योग २७ है, शिव शक्ति भेद से ५४ ।
आकाश की किरणें:—सब ३६ तत्व, शिव शक्ति भेद से ७२