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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 161

सौंदर्य लहरी १२५
तत्त्वों की किरणें
[ १४ ]
क्षितौ षट्पंचाशद्द्विसमधिकपंचाशदुदके
हुताशे द्वाषष्टिश्चतुरधिकपंचाशदनिले
दिवि द्विःषट्त्रिंशन्मनसि च चतुःषष्टिरिति ये
मयूखास्तेषामप्युपरि तव पादाम्बुजयुगम् ॥
अर्थः— पृथिवी में ५६, जल में ५२, अग्नि में ६२,
वायु में ५४, आकाश में ७२, और मन में ६४ मयूखा अर्थात्
रश्मियों के ऊपर, हे देवि ! तेरे दोनों चरण कमल हैं ।
सं० टि० मातृका न्यास में छःओं चक्रों का न्यास हंसः सहित
उक्त किरणों से संबंधित अक्षरों से किया जाता है ।
उक्त किरणें छः चक्रों से संबंध रखने वाले तत्त्वों की किरणें
हैं, और भगवती के चरण युगल सब के ऊपर होने का अभिप्राय
यह है कि वे आज्ञा चक्र के ऊपर बिराजते हैं । उक्त किरणों में
आधी शिवात्मिका और आधी शक्त्यात्मिका हैं, अर्थात् दो दो के
जोडे से पृथिवी में २८, जल में २६, अग्नि में ३१, वायु में २७,
आकाश में ३६ और मन में ३२ किरणों के जोडे हैं । सब का
योग ३६० है, जो चान्द्र वर्ष के अनुसार एक वर्ष की ३६०
तिथियों से उपमित की जाती हैं । प्रत्येक पक्ष की १५ तिथियों
को १५ नित्या कहते हैं । श्री चक्रस्थ षोडश दल की गुप्ततर
योगिनियां नित्या कहलाती हैं ।