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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 151

सौंदर्य लहरी १०७
३६ तत्व जिनका वर्णन हम ऊपर प्रथम श्लोक के नीचे कर
आये हैं, सप्त धातुओं सहित ४३ हो जाते हैं। सात धातुओं के
नाम ये हैं—रक्त, मांस, मेदा, स्नायु, अस्थि, मज्जा और शुक्र ।
५ शिवयुवतियां शान्त्यातीतादि ५ कलायें अथवा शक्ति,
शुद्धविद्या, माया, कला और अशुद्धविद्या हैं और ४ श्रीकंठ,
सदाख्य, महेश्वर, महत्तत्व और पुरुष (जीव) हैं अथवा पुरुष,
अव्यक्त, महत् और अहंकार ४ श्रीकंठ हैं, जिनके साथ शब्दस्पर्शादि
५ तन्मात्रायें शिवयुवतियां माननी पड़ेंगी ।
गीता में भगवान ने नवधा प्रकृति का वर्णन किया है, एक जीव-
भूता परा प्रकृति और अष्टधा अपरा प्रकृति । वहां आकाशादि से ५
तन्मात्रा और मन, बुद्धि, अहंकार से समष्टि अहंकार, महत् और
अव्यक्त क्रमशः समझना चाहिये । देखें गीता अध्याय ७ के श्लोक
४, ५ पर शंकर भाष्य ।
श्रीचक्र के उपरोक्त क्रम से ९ विभाग किये जाते हैं, जिनमें
विन्दु प्रथम है और मध्यस्थ त्रिकोण दूसरा इत्यादि और प्रत्येक विभाग
को आवरण कहते हैं। श्रीचक्र का विशेष विवर्ण साथ दिये हुए
विवर्ण पत्र (chart) पर देखें ।
यह विधि सौन्दर्य लहरी के भाष्यकार कैवल्य शर्मा के मता-
श्री चक्र निर्माण नुसार है। श्री चक्र मनुष्य देह का प्रतीक है
की विधि और मनुष्य देह का माप अपनी अंगुलियों के
नाप से ९६ अंगुल प्रमाण होता है। इसलिये
श्री चक्र का माप भी ९६ इकाइयों पर रखा जाता है । एक ८ इंच