सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी १०१
मुख चन्द्र के बीच में विशुद्ध चक्र के १६ दल चन्द्रमा की १६
कलाओं के सदृश चमकने लगते हैं। कुण्डलिनी शक्ति जागकर
जब सूर्य मण्डल से ऊपर चढ़ती है, तब सूर्य को ऊर्द्धमुख कर देती है।
फिर कुण्डलिनी शक्ति उससे भी ऊपर जाकर चन्द्र मण्डलका बेध करती
हुई सहस्रार में उठती है, तब चन्द्रमा भी अमृत की वर्षा करने लगता
है और सारे देह की नाड़ियां उस अमृत से भर जाती हैं और योगी
का शरीर दिव्य बन जाता है।
वेध के समय शक्ति की गति मूलाधार से सहस्रार की ओर
अवसरण अर्थात होती है जिसका वर्णन ऊपर के श्लोक में दिया
अन्वय भूमिका गया है। सहस्रार से नीचे उतरते समय वह
नाड़ियों को अमृत से सींचती हुई मूलाधार की
ओर लौटती है। आरोह को उन्नेय भूमिका और अवरोह को
अन्वय भूमिका कहते हैं। प्रत्यावृत्ति भूमिका से कुण्डलिनी का नीचे
उतर कर अपने स्थान पर गुहा में लौट आने का अभिप्राय है।
गत श्लोक में उन्नेय भूमिका का वर्णन किया गया है और अगले
श्लोक में अन्वय और प्रत्यावृत्ति भूमिकाओं का वर्णन है इनको
अप्यय और प्रभव क्रम भी कहते हैं। दोनों के सिद्ध होने पर योग
की सिद्धि होती है। कहा है ‘योगोहि प्रभवाप्ययौ’ कठोपनिषत् ।
यह उभय क्रम कुण्डलिनी सोपान रहस्य के नाम से प्रसिद्ध है।
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सुधाधाराऽऽसारैश्चरण युगलान्तर्विगलितैः
प्रपंचं सिञ्चन्ती पुनरपि रसाम्नाय महसा ।