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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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सौन्दर्य लहरी ९९
वहां विद्युत् का रूप धारण कर लेती है। जैसे ग्रीष्म ऋतु में जल का
वेध होकर वर्षा ऋतु में मेघों में विद्युत् प्रकट हुआ करती है।
योनिस्थान में प्रदीप्त अग्नि नीचे मूलाधार में पृथिवी तत्व को तपाता
है और ऊपर स्वाधिष्ठानस्थ जल को। जल वाष्प बन कर मणिपुर
(नाभिचक्र) में मेघवत् आच्छादित हो जाता है और वहां अग्नि
का वेध होकर वह विद्युत् का रूप धारण कर लेती है। देखें श्लोक
३९, ४० । ग्रीष्म ऋतु में गरमी से पृथिवी तप्त होकर जल सूखने
लगता है, यह जल का वेध है। वर्षा में वह ही जल मेघों के रूप
में परिणत हो जाता है, और उनके ताप से विद्युत् प्रकट होती है,
यह अग्नि का वेध है।
✱चक्रों का स्थान मेरुदंड (spinal bone) के भीतर नीचे
से मस्तिष्क तक उठने वाली सुषुम्ना नाडी (spinal cord) में
है। इसके द्वारा शरीर की नाडियों का मस्तक से संबंध है। गुदा
के पीछे एक मांसपेशी है, जिसे कंद कहते हैं, उसकी नाभि अर्थात्
केन्द्र में कुण्डलिनी स्वयंभूलिंग पर साढे तीन कुंडल डाले सोती
रहती है। जागकर वह स्वाधिष्ठान चक्र में रहने लगती है। उस
अवस्था में जीव को बिन्दु रूपी शिव कहते हैं और कुंडलिनी को
जीव रूपा शक्ति।
आज्ञा चक्र में चढकर वह ही परमात्मा रूपा शक्ति त्रिपुरा
कहलाती है जो सहस्रार में शिव के साथ सायुज्यता प्राप्त कर लेती
✱ चक्रों और नाडियों की सविस्तार जानकारी के लिये लेखक
का अंग्रेजी ग्रंथ Divine Power पढ़ें।