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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

Devanagarihipublished302 pages

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सन्तति-शास्त्र ।

जाता है तब वे श्रवयव विरुत अर्थात् देहे इत्यादि हां जाते हैं । (च० १० अ० ४ श्लो० १५)

१८. वीर्यमें जब हडिडियोंको बनानेवाला अंश दूषित हो जाता है तब वीनी सन्तान उत्पन्न होती । (१० क०)

१९. यदि गर्भाधान समयमें पिताका थोडा वीर्य गिरे तो ऐसे पितासे नरप० सन्तान उत्पन्न होती है ।

(च० १० अ० २ श्लो० १८)

२०. गर्भके जो श्रवयव वीर्यके जिस अंशसे उत्पन्न हों हैं उस वीर्यके उसी अंशके दूषित होने से गर्भके वेही श्रवयव दूषित हो जाते हैं । (च० १० अ० ४ श्लो० २५)

२१. वीर्य रक्त और गर्भाशयकारक अंश दूषित होनेसे स्त्री वन्ध्या कन्याको उत्पन्न करती है ।

(च० १० अ० ४ श्लो० ३९)

२२. वीर्यमें रज और गर्भाशय-कारक अंश दूषित हों तथा आनुवंशिक स्त्री-चिह्न प्रगटकर्ता बीजांश दूषित होनेसे गर्भिणी स्त्री—स्त्रीकी आकृतिवाली, योनि रहित पाला नामक सन्तान-उत्पन्न करती है । (च० १० अ० ४ श्लो० ४५)

२३. मिले हुए रजवीर्यमें जब वीर्य उत्पन्न करनेवाली वीर्यका अंश दूषित होने और आनुवंशिक पुरुष चिह्न कारक बीजांश दूषित होनेसे पुरुषकी सी आकृतिवाली नाम० कृष्णतिक नामक सन्तान उत्पन्न होती है । इसको पुरुष भ्रष्ट श्रवयव पुरुष नश कहते हैं ।

(च० १० अ० ४ श्लो० ५५)

वीर्य और सन्तानका बहुत बडा सम्बन्ध है । जिनने मनुष्योंके सन्तान होती है सबके लिये यह नहीं कहा जा सकता कि उनका वीर्य शुद्ध और नीरग है । यहाँ एक बहुत