संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
by महर्षि वाल्मीकि
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अनुभव किया, जिसमें बहुत-से पर्वत, समुद्र, पृथ्वी, नदियों, नरेश और उनके राज्यकी सीमाएँ दृष्टिगोचर होती थीं। वह लोक क्रिया तथा काल आदिकी कल्पनाओसे युक्त था। इसके बाद उसी तरहके मकरूपका आनन्द लेनेवाले देवेन्द्रने वहाँ तीनों लोकोंको देखा, जो पाताल, पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग, सूर्य और पर्वत आदि अनेक पदार्थोंसे भरे-पूरे थे। फिर उसी त्रिलोकीमें भोगराशिसे विभूषित हुए इन्द्र देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हुए। कुछ कालके बाद उन्हें एक पराक्रमी पुत्र प्राप्त हुआ, जिसका नाम था कुन्द। तत्पश्चात् वे प्रशंसाके योग्य देवराज इन्द्र जीवनके अन्तमें शरीरका परित्याग करके मोक्षको प्राप्त हो गये। इसके बाद उनके पुत्र कुन्द त्रिलोकीके राजा हुए। फिर वे भी अपने एक पुत्रको जन्म देकर जीवनके अन्तमें कालके अधीन हो परमपदको प्राप्त हुए। तदनन्तर कुन्दका पुत्र भी पिताकी ही भाँति दीर्घकालतक राज्य करनेके पश्चात् अपने पुत्रको राजसिंहासनपर बिठाकर जीवनके अन्तमें परमपदको प्राप्त हो गया। सुन्दर ! इस प्रकार उस देवराज इन्द्रके सहस्रों पौत्र राज्यपर प्रतिष्ठित हुए और कालके गालमें चले गये। आज भी वहाँ उन्हींके पौत्रोंका राज्य है, जिनमेंसे अंशक इस समय राजसिंहासनपर प्रतिष्ठित है।
( सर्ग १३ )
इन्द्र-कुलमें उत्पन्न हुए एक इन्द्रका विचार-दृष्टिसे परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार करके इस त्रिलोकीके इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित होना तथा अहंभावनाके निवृत्त होनेसे संसार-भ्रमके मूलोच्छेदका कथन
भुशुण्डजी कहते हैं—विद्याधर ! पहले जिनकी चर्चा की गयी है, उन्हीं इन्द्रके कुलमें कोई उत्तम गुणों-से सम्पन्न कान्तिमान् बालक उत्पन्न हुआ, जो देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हुआ। कुछ कालके पश्चात् बृहस्पतिके उपदेशसे उन इन्द्रके उस वंशजको आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करानेवाला ज्ञान प्राप्त हुआ। फिर तो उसे जानने योग्य आत्मतत्त्वका ज्ञान हो गया। वह प्रारब्धके अनुसार जो कुछ प्राप्त होता, उसीमें संतोष करता था। इस प्रकार रहते हुए उस इन्द्रवंशी देवराजने तीनों लोकोंका राज्य किया।
ज्ञान-बलसे सुशोभित होनेवाले उन देवेन्द्रके मनमें किसी समय ऐसी इच्छा उत्पन्न हुई कि 'मैं भलीभाँति ध्यान लगाकर ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार करूँ।' ऐसा विचार कर वे एकान्तमें बैठ गये और बाहर-भीतरके सम्पूर्ण विक्षेपोंसे रहित शान्त-चित्त हो ध्यान-समाधि लगाकर परब्रह्मके स्वरूपको विचार-दृष्टिसे देखने लगे। उन्होंने अनुभव किया कि परब्रह्म परमात्मा सम्पूर्ण शक्तियोंसे सम्पन्न है। सर्व-वस्तुस्वरूप, सर्वत्र व्यापक, सब प्रकारसे सर्वदा सर्वमय है। सबके साथ सर्वत्र विद्यमान है और सबमें व्यापक है। उसके सब ओर हाथ-पैर हैं, सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं तथा सब ओर कान हैं; क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है। वह सम्पूर्ण इन्द्रियोंके गुणोंसे रहित होता हुआ भी सम्पूर्ण इन्द्रियोंके गुणोंसे युक्त है। आसक्तिरहित होनेपर भी सबका धारण-पोषण करनेवाला है तथा निर्गुण होकर भी गुणोंको भोगनेवाला है। वह चराचर सभी प्राणियोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण है। अचर और चररूप भी वही है। सूक्ष्म होनेके कारण वह जाननेमें नहीं आता है। वह अति समीपमें है और दूरमें भी है। चन्द्रमा और सूर्यके रूपमें वही है। उसीने पृथ्वीका रूप धारण कर रखा है और वही पर्वत तथा समुद्रके रूपमें है, वह सर्वत्र सारभूत एवं गुरु है। वही आकाशरूपसे विद्यमान है। सर्वत्र संसृति और जगत्के रूपमें भी वही है। वह सभी स्थानोंमें मोक्षरूपसे