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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished750 pages

Page 229 of 750

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Page 229

१९२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सरिताओंकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण दृश्य-दर्शन ब्रह्मके ही संकल्पसे प्रकट हुए हैं। ये सारे दृश्य-दर्शन द्रष्टा ब्रह्मके स्वरूपसे भिन्न नहीं हैं—ठीक वैसे ही, जैसे चाँदनी चन्द्रमासे और प्रकाश तेजसे पृथक् नहीं है। इस तरह जो नाना प्रकारकी जीवोंकी श्रेणियाँ हैं, ये जिस ब्रह्मसे उत्पन्न होती हैं, उसीमें लीन भी हो जाती हैं। रघुनन्दन ! इस प्रकार भगवान् परब्रह्म परमात्माकी इच्छासे व्यवहारमें लगे हुए जो विचित्र आकारवाले रूप-वैभवसे सम्पन्न पूर्वोक्त प्राणिवर्ग हैं; वे आगसे प्रकट होनेवाली चिनगारियोंके समान विभिन्न लोकोंमें आते, जाते और ऊँची-नीची योनियोंमें जन्म लेकर भ्रमण करते हैं। (सर्ग ९४)


कर्ता और कर्मकी सहोत्पत्ति एवं अभिन्नता तथा चित्त और कर्मकी एकताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जैसे वृक्षसे फूल और उसकी गन्ध दोनों साथ ही उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार सृष्टिके आदिमें परम-पदरूप ब्रह्मसे परस्पर अभिन्न कर्म और कर्ता दोनों स्वयं (स्वभाववश) ही एक साथ प्रकट हुए। जैसे अज्ञानी लोगोंकी दृष्टिमें सर्वत्र फैले हुए निर्मल आकाशके भीतर नीलिमा प्रतीत होती है, उसी तरह समस्त संकल्पोंसे रहित सर्वव्यापी विशुद्ध ब्रह्ममें अज्ञ पुरुषोंकी दृष्टिसे ही जीवोंका प्राकट्य प्रतीत होता है। राघव ! जहाँ अज्ञानी लोगोंका ही आचार-व्यवहार दिखायी देता है, वहींपर 'जीव ब्रह्मसे उत्पन्न हुए हैं' ऐसी उक्तियाँ टिक पाती हैं। किंतु जहाँपर ज्ञानी पुरुषोंका व्यवहार है, वहाँ यह कहना शोभा नहीं देता कि 'यह वस्तु तो ब्रह्मसे उत्पन्न हुई है और यह नहीं हुई है।' अतः भेददृष्टिसे जो शोचनीय द्वैत-कल्पना की गयी है, उसे व्यवहारमात्रके लिये स्वीकार करके यह उपदेश दिया जाता है कि 'यह ब्रह्म है और ये जीव हैं।' वास्तवमें यह कथन केवल वाणी-का विलासमात्र है। ये सब जीवराशियाँ सदा उस परमात्मामें स्थित रहती हैं, उसीसे उत्पन्न होती हैं और उसीमें लीन हो जाती हैं। रघुनन्दन ! जैसे फूल और गन्ध एक दूसरेसे अभिन्न हैं, उसी तरह पुरुष (कर्ता) और कर्म परस्पर अभिन्न हैं। ये परमात्मासे प्रकट होते और धीरे-धीरे उसीमें लीन हो जाते हैं। ये दैत्य, नाग, मनुष्य और देवता इस जगत्में वस्तुतः उत्पन्न हुए बिना ही वासनाओंके साथ उत्पन्न होते-से प्रतीत होते हैं और तुरंत गमन आदि क्रियासे युक्त हो जाते हैं। साधो ! उन दैत्य, नाग, मनुष्य और देवता आदिके संसार-भ्रमणमें आत्माके यथार्थ ज्ञानके अभावके अतिरिक्त दूसरा कोई कारण नहीं दिखायी देता। वह आत्मविस्मरण ही जन्मान्तररूपी फल प्रदान करनेवाला है।

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! श्रुति, स्मृति-रूप प्रामाणिक दृष्टिवाले, वीतराग ऋषियोंद्वारा अर्थमें श्रुतिसे विरोध न रखनेवाले जो-जो स्मृति, पुराण एवं इतिहास आदि ग्रन्थ सिद्धान्त-निर्णयपूर्वक रचे गये हैं, वे सब शास्त्र कहलाते हैं। जो महान् सत्त्वगुणसे सम्पन्न, धीर (ज्ञानी) और समदर्शी हैं तथा जिन्हें अनिर्वचनीय ब्रह्मका साक्षात्कार हो चुका है, वे पुरुष साधु (श्रेष्ठ संत) कहे गये हैं। जिन्हें तत्त्वज्ञान नहीं हुआ है, उन पुरुषोंके सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये (उन्हें धर्म और ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार करानेके लिये) श्रेष्ठ पुरुषोंका सदाचार और श्रुति-स्मृतिरूप शास्त्र—ये ही दो नेत्र हैं।

उनकी दृष्टि सदा इन (दोनों—सदाचार और शास्त्र) का ही अनुसरण करती है। जो पुरुष श्रेष्ठ व्यवहारके लिये शास्त्रका अनुसरण नहीं करता, उसका सभी शिष्टजन बहिष्कार कर देते हैं और वह दुःखमें निमग्न