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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished750 pages

Page 169 of 750

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Page 169

१३४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

नगर है, उसमें मैं उनकी राजमहिषीके रूपमें स्थित हूँ। यहीं उस अन्तःपुरमें मेरे पति राजा पद्मकी मृत्यु हुई और इसी अन्तःपुरके आकाशमें वह नगर है, जिसमें वे पुनः राजा हुए हैं। ब्रह्माजीसे उत्पन्न होनेके पश्चात् आजतक विभिन्न योनियोंमें जो मेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं, उनमेंसे आठ सौ जन्मोंको तो मैं इस समय पुनः देख-सी रही हूँ, उनकी सारी बातोंका स्पष्टरूपसे स्मरण कर रही हूँ। देवि! पहले किसी दूसरे संसार-मण्डलमें मैं लोकान्तररूपी कमलकी भ्रमरी—विद्याधर-राजकी धर्मपत्नी हुई थी। उन दिनों मेरा हृदय दुर्वासनाओंसे दूषित था। इसलिये उसके बाद मैं मनुष्ययोनिमें उत्पन्न हुई, तदनन्तर दूसरे संसार-मण्डलमें मैं नागराजकी भार्या हुई। इसके बाद कदम्ब, कुन्द, जम्बीर और करञ्जोंके वनमें निवास करनेवाली तथा वृक्षोंके पत्तोंको ही वस्त्रके रूपमें धारण करनेवाली काली-कलूटी भीलनी हुई।

तदनन्तर पुरुषत्वरूपी फल देनेवाले कर्मोंके परिणाममें-से मैं सौ वर्षोंतक सौराष्ट्र देशमें श्रीसम्पन्न राजा होकर रही। फिर राजा-शरीरसे बने हुए दुष्कर्म-दोषके कारण ताड़ वृक्षके नीचे किसी नदीके कछारमें नौ वर्षोंतक नेवलीकी योनिमें रही। उस समय मेरे सारे अङ्ग कुष्ठ-रोगसे नष्टप्राय हो गये थे। देवि! उसके बाद मैं सौराष्ट्र देशमें आठ वर्षोंतक गौका शरीर धारण करके रही। उस योनिमें दुर्जन, दुष्ट, अज्ञ और बालक ग्वालों-की मारने-पीटने आदि क्रीड़ाओंका साधन बनी रही। फिर क्रमशः पक्षिणी, भ्रमरी, मनोहर नेत्रवाली हरिणी, मछली, पुलिन्द जातिकी स्त्री सारसी और राजहंसी हुई। इस प्रकार नाना प्रकारके शत-शत दुःखोंसे संकुल अनेकानेक योनियोंमें मैंने भ्रमण किया है। तराजूके पलड़ेकी भाँति कभी ऊँचे उठने और कभी नीचे गिरनेसे मेरे सारे अङ्ग व्याकुल होते रहे हैं। मैं संसाररूपी विशाल सरिताकी चञ्चल तरङ्ग बनकर उठती और विलीन

होती रही हूँ। जैसे वातप्रमी जातिकी हरिणीकी गतिको रोकना कठिन है, उसी प्रकार मैं दुर्निवार्य आवागमन-की परम्परामें पड़कर क्रमशः विभिन्न योनियोंमें भटकती आयी हूँ।

इस प्रकार परस्पर वार्तालाप करती हुई वे दोनों सुन्दरी ललनाएँ मनोहारिणी गतिसे उस घरके बाहर निकलीं। उस समय गाँवके लोग उन्हें नहीं देख पाते थे, परंतु वे दोनों अपने सामनेके पर्वतको अच्छी तरह देख रही थीं।

लीला बोलीं—देवि! इस देशको देखकर मैं आपकी कृपासे अपने पूर्वजन्मकी उन सभी विविध चेष्टाओंका स्मरण करती हूँ, जो यहाँ घटित हुई हैं; मैं यहाँ बूढ़ी ब्राह्मणीके रूपमें रहती थी। मेरे सारे अङ्ग उभरी हुई नस-नाड़ियोंसे व्याप्त दिखायी देते थे। मैं बहुत दुबली-पतली थी। मेरा शरीर गौर और बाल सफेद थे। मेरी हथेली सूखे कुशों-के अग्रभागसे छिन्न-भिन्न होती रहनेके कारण रूखी हो गयी थी। मैं अपने पतिदेवके कुलकी वृद्धि करनेवाली