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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

by महर्षि कपिल

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished81 pages

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[Page-header] (६२) तीनों दर्शनके तात्पर्यका उद्घाटन ।
की गतिके अनुसार अविच्छिन्न ही रहती है, जिस आत्मदेश
को "मैं शरीरी हूं" "मैं सुखी हूं" "मैं दुःखी हूं" ऐसा
ज्ञान होता है, उसी में "मैं अशरीरी हूं" "मैं सुख दुःख
रहित तथा विभू हूं" ऐसा ज्ञान नहीं होता, सर्वथा अन्य
आत्मदेशमें अज्ञान और अन्यही आत्मदेशमें ज्ञान उत्पन्न
होता, अन्य ही देश बद्ध और अन्य ही मुक्त होता है ।
सम्पूर्ण आत्मा में बंधन तथा मोक्षका प्रभाव नहीं पड़ता ।
क्योंकि मनोदेश के अतिरिक्त देशमें आत्मा को न ज्ञान होता
है, और न सुख दुःख आदि की प्रतीति होती है, इसी से वह
अन्य देश में मुक्त ही रहता है ।
सब शरीरों में सभी आत्मा रहते हैं, तथा उनके वहां
रहने में किसी की अपेक्षा किसीमें विशेष नहीं है, देवदत्त के
शरीर में जिस प्रकार देवदत्त का आत्मा रहता है उसी प्रकार
अन्य सम्पूर्ण आत्मा रहते हैं, किन्तु देवदत्त के मन के संयोग
से देवदत्त के आत्माको ही ज्ञान होता है, अन्य सब आत्मा
जो वहां उसके समान ही रहते हैं, उन्हें किसी प्रकारका बोध
नहीं होता, जैसे आकाश कदाचित् संख्या से अनन्त हों, और
वे सब मिल कर एक हो सकते हैं, इसी प्रकार सब आत्माभी
मिल कर एकीभाव से रहते हैं, उनके विभाग का करने वाला
कोई अन्य पदार्थ इन शास्त्रों में कल्पित नहीं है कि-जिसके
मध्य में पड़ने से सब आत्मा परस्पर भिन्न रहें । विभु;आत्मा
के भेद के स्वीकार करने में इन्हें यही आवश्यकता थी कि
यदि एक ही आत्मा रहा तो एक के मुक्त होने पर सब जीव
मुक्त होजांयगे, अर्थात्-संसार में कोई न कोई मुक्त होते ही
सब संसार ही लय हो जायगा, सब संसार का एक दम नष्ट