Skip to content
SarvaKosh
सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

by महर्षि कपिल

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished81 pages

Page 70 of 81

Read in context
Page 70

सांख्य, न्याय और वैशेषिक दर्शन का जीवात्मा ( ५५ )

में भी प्रवेश कर जाता है, संसार में कोई ऐसी कठोर वस्तु
नहीं है, जिस में वह प्रवेश न कर सके । सृष्टि के आरम्भ से
महाप्रलय तक बना ही रहता है । महत्तत्व (१) अहकार (२)
मन (३) चक्षुः (४) श्रोत्र (५) घ्राण (६) रसन (७) त्वक् (८)
वाणी (६) हस्त (१०) पाद (११) गुद् (१२) उपस्थ (लिङ्ग या
योनि) (१३) रूप (१४) रस (१५) गन्ध (१६) स्पर्श (१७) शब्द
(१८) इन अठारह तत्वों का समुदाय रूप है । यही लिङ्ग
शरीर पूर्व २ स्थूल शरीर को छोड़ता और नवीन २ को ग्रहण
करता है । इस लिङ्ग शरीर के विना स्थूल शरीर आत्मा के
भोग का साधन नहीं, बनता, इसी से इसकी कल्पना करनी
पड़ती है । धर्म, अधर्म, ज्ञान, अज्ञान, वैराग्य, अवैराग्य,
ऐश्वर्य और अनैश्वर्य ये आठों भाव इसी लिङ्ग शरीर में,
रहते हैं, इसीसे जन्म-मरण रूप संसार इसीको होता है, और
इसी के द्वारा इसके आत्माका होता है, जो इसके साथ सम्ब-
न्ध रखता है । वास्तव में उक्त आठों भाव, बुद्धि-जिसको मह-
त्तत्व या अन्तः करण कहते हैं,और जो लिङ्ग शरीरके अठारह
तत्वों में से एक है, उसी में रहते हैं, और उसमें रहने के
कारण ही लिङ्ग शरीर में माने जाते हैं । महाप्रलयके अनन्तर
जैसे कि-प्रधान बना रहता है नहीं रहता है किन्तु उसी प्रधान
में जिससे कि-यह सृष्टि के आरम्भ कालमें उत्पन्न होता है,
लय होजाने से ही इसे 'लिङ्ग' कहते हैं ।
मोक्ष ।
प्रकृतिका परिणाम बुद्धि है, अर्थात्-सृष्टि के आरम्भमें
प्रकृति से पहले बुद्धिही उत्पन्न होती है, इस के महत्तत्व
और अन्तःकरण ये दो नाम और हैं । सांख्य-- मतमें इसी
बुद्धिमें सुख दुःख रहते हैं, इसीके सुख दुःखोंकी छाया आत्मा