Skip to content
SarvaKosh
सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

by महर्षि कपिल

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished81 pages

Page 58 of 81

Read in context
Page 58

हिन्दी सांख्यदर्शन (४३)
का संक्षेप धर्म आदि ८भेदों में और विस्तार ५० भेदों में कहा
गया है। तथा दूसरी लिङ्ग सृष्टि, अहंकार के द्वारा ११ इन्द्रि-
यों और ५ तन्मात्रों के रूप में है, जिस का विस्तार
स्थूल देह आदि स्थावर जङ्गम सभी है। इन दोनों सृष्टियों
के सम्बन्ध में यह प्रश्न होता है, कि बुद्धि ने दो सृष्टियें क्यों
कीं, एक ही सृष्टि से भी उस की चरितार्थता हो जाती ? इसी
के उत्तर के अर्थ यह कारिका है।
इस का भाव यह है, कि-धर्म, अधर्म आदि भावों के
विना लिङ्ग या तन्मात्र की सृष्टि का सम्भव नहीं । क्यों कि
पूर्व २ संस्कारों ( धर्म अधर्म आदिकों ) के अनुसार ही
पिछले २ या अपूर्व २ शरीरों की प्राप्ति होती है। एवम् लिङ्ग
आदि के विना धर्म आदि भी नहीं हो सकते । क्योंकि धर्म
अधर्म आदि सब स्थूल सूक्ष्म देह के ही साध्य हैं। इस प्रकार
बीज अंकुर के दृष्टान्त पर दोनों सृष्टियों का प्रयोजन है।
इसे अन्योऽन्याश्रय दोष भी न समझना चाहिये, क्योंकि जो
बीज जिस अंकुर से होता है, वह अंकुर उसी बीज से नहीं
होता, बल्कि-वह किसी दूसरे बीज से हुआ है। ऐसे ही
अंकुर पक्ष को भी समझना चाहिये ॥ ५२ ॥
१४ प्रकार का भूत सर्ग ।
अष्टविकल्पो दैवस्तैर्यग्योनश्च पञ्चधा भवति ।
मानुषकश्चैकविधः, समासतो भौतिकः सर्गः ॥५३॥
( क ) ८ प्रकार का देव सर्ग ( सृष्टि ) है—( १ ) ब्रह्मा
( २ ) प्रजापति ( ३ ) इन्द्र ( ४ ) पितर ( ५ ) गन्धर्व ( ६ )
यक्ष ( ७ ) राक्षस ( ८ ) पिशाच ।
( ख ) तिर्यग्योनि-सर्ग ५ प्रकार का-( १ ) पशु ( २ )
मृग (३) पक्षी (४) सरीसृप (सर्पादि) (५) स्थावर (वृक्षादि) ।