सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextहिन्दी सांख्यदर्शन (२६)
अन्य दो अन्तःकरणों (मन, अहंकार) सहित बुद्धि
अर्थात् तीनों अन्तःकरण जिससे कि-भूत, भविष्यत् और
वर्त्तमान काल में शब्द आदि सब विषयों को अवगाहन
(ग्रहण) करते हैं, इससे उक्त तीनों अन्तःकरण द्वारि (प्रधान)
और शेष बाह्य इन्द्रियें द्वार (अप्रधान या गौण) हैं ॥ ३५ ॥
मन और अहंकार दोनों की अपेक्षा बुद्धि की प्रधानता
एते प्रदीपकल्पाः परस्परविलक्षणा गुणविशेषाः ।
कृत्स्नं पुरुषस्यार्थ प्रकाश्य बुद्धौ प्रयच्छन्ति ॥३६॥
ये सब बुद्धि के अतिरिक्त जितने करण हैं, अर्थात्-५ ज्ञा-
नेन्द्रियें ५ कर्मेन्द्रियें, अहंकार और मन (कुल १२) सब
दीपक के समान हैं। अपनें २ विषय को प्रकाश करने वाले
हैं। आपस में सब विलक्षण हैं, भिन्न २ विषय वाले हैं। और
गुण विशेष हैं, सत्व आदि गुणों से उत्पन्न हुये २ हैं। पुरुष
को जो २ कुछ विषय अपनें में भान होता हुआ प्रतीत होता
है, उस सब को ये करण (इन्द्रियें) अपनें २ विषय के अनु-
सार प्रकाशित करके बुद्धि में स्थापित करते हैं। प्रयोजन यह
है कि-जो विषय बाहरी इन्द्रियों में भासता है, वही भीतरी
इन्द्रिय मन में विशेष रूप से पड़ता है, फिर वही अहंकार-
में पहुंचता है, जिसका कि-उसे अभिमान होता है, और वही
विषय उस के द्वारा बुद्धि में चमकता है, जिसका कि-उसे
अध्यवसाय (निश्चय) होता है। बस इससे आगे वह विषय
कहीं नहीं जाता, अतः इनमें सर्व प्रधान बुद्धि ही है। इनके
मत में इन्द्रिय आदि संघात का अध्यक्ष बुद्धि तत्व ही है। नैया
यिकों के समान आत्मा अध्यक्ष नहीं है। अर्थात् उनके मतमें
सब पदार्थों का ज्ञान साक्षात् सम्बन्ध से आत्मा में ही उत्प-
न्न होता है, इन्द्रियें उसी के साधन हैं अतः वही अध्यक्ष