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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 985 of 1855

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Page 985

है. (१)
वेद यस्त्रीणि विदथान्येषां देवानां जन्म सनुतरा च विप्रः.
ऋजु मर्तेषु वृजिना च पश्यन्नभि चष्टे सूरो अर्य एवान्.. (२)
जो सूर्य तीन जानने योग्य स्थानों को जानते हैं, जो मेधावी—सूर्य इन तीनों लोकों में
छिपे देवों के जन्मस्थान को जानते हैं, वे ही मानवों की भलाई-बुराई को देखते हैं एवं मानवों
के स्वामी बनकर अभिलाषाएं पूरी करते हैं. (२)
स्तुष उ वो मह ऋतस्य गोपानदितिं मित्रं वरुणं सुजातान्.
अर्यमणं भगमदब्धधीतीनच्छा वोचे सधन्यः पावकान्.. (३)
हम महान् यज्ञ के रक्षक एवं शोभन जन्म वाले अदिति, मित्र, वरुण, अर्यमा एवं भग
की स्तुति करते हैं. मैं अहिंसित कर्मों वाले, धनसंपन्न एवं पवित्र करने वाले देवों का यश
वर्णन करता हूं. (३)
रिशादसः सत्पतीँ रदब्धान्महो राज्ञः सुवसनस्य दातॄन्.
यूनः सुक्षत्रान्क्षयतो दिवो नॄनादित्यान्याम्वदितिं दुवोयु.. (४)
हे हिंसकों को दूर भगाने वाले, सज्जनों का पालन करने वाले, अपराजेय, महान्
स्वामी, शोभन-निवासस्थान देने वाले, युवा शोभन-बल वाले, सर्वव्यापक एवं स्वर्ग के नेता
आदित्यो! मैं अपनी परिचर्या करने वाली अदिति की शरण जाता हूं. (४)
द्यौ३ष्पितः पृथिवि मातरध्रुगग्ने भ्रातर्वसवो मृळता नः.
विश्व आदित्या अदिते सजोषा अस्मभ्यं शर्म बहुलं वि यन्त.. (५)
हे पिता रूप स्वर्ग, माता रूप धरती एवं भ्राता रूप अग्नि तथा वसुओ! तुम सब हमें
सुखी करो. हे सब आदित्यो एवं अदिति! तुम समान प्रेम वाले होकर हमें अधिक सुख दो.
(५)
मा नो वृकाय वृक्ये समस्मा अघायते रीरधता यजत्राः.
यूयं हि ष्ठा रथ्यो नस्तनूनां यूयं दक्षस्य वचसो बभूव.. (६)
हे यज्ञपात्र देवो! हमारा अनिष्ट चाहने वाले वृक एवं वृकी को हमे मत सौंपना. तुम ही
हमारे शरीर, बल और वाणी के रक्षक रहे हो. (६)
मा व एनो अन्यकृतं भुजेम मा तत्कर्म वसवो यच्चयध्वे.
विश्वस्य हि क्षयथ विश्वदेवाः स्वयं रिपुस्तन्वं रीरिषीष्ट.. (७)
हे देवो! तुम्हारे कृपापात्र हम दूसरों के द्वारा किए गए पाप का कष्ट न भोगें. हे वसुओ!
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