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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 899 of 1855

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Page 899

करो. (१०)
अच्छा नो मित्रमहो देव देवानग्ने वोचः सुमतिं रोदस्योः.
वीहि स्वस्तिं सुक्षितिं दिवो नॄन्द्धिषो अंहांसि दुरिता तरेमा ता तरेम तवावसा तरेम..
(११)
हे अनुकूल दीप्ति वाले एवं धरती-आकाश में वर्तमान अग्नि देव! तुम हमारी स्तुति देवों
को भली प्रकार बताओ. हम स्तोताओं को शोभन गृह के साथ सुख दो. हम शत्रुओं को नष्ट
करके पापों के पार जावें. तुम्हारी कृपा से हम शत्रु से छुटकारा पावें. (११)
सूक्त—३ देवता—अग्नि
अग्ने स क्षेषदृधपा ऋतेजा उरु ज्योतिर्नशते देवयुष्टे.
यं त्वं मित्रेण वरुणः सजोषा देव पासि त्यजसा मर्तमंहः.. (१)
हे अग्नि! यज्ञपालनकर्त्ता एवं यज्ञ के हेतु जन्म देने वाला यजमान चिरकाल जीवित रहे
एवं देवाभिलाषी बनकर तुम्हारी विशाल ज्योति धारण करे. हे अग्नि देव! तुम मित्र एवं वरुण
के साथ मिलकर तेज द्वारा पाप से उसकी रक्षा करते हो. (१)
ईजे यज्ञेभिः शशमे शमीभीर्ऋद्धद्वारायाग्नये ददाश.
एवा चन तं यशसामजुष्टिर्नांहो मर्तं नशते न प्रदॄप्तिः.. (२)
समृद्ध धन वाले अग्नि को हव्य देने वाला यजमान समस्त यज्ञों में सफल एवं
चांद्रायणादि व्रतों द्वारा शांत बनाता है, यशस्वी संतान से रहित नहीं होता तथा पाप व घमंड
से दूर रहता है. (२)
सूरो न यस्य दृशतिररेपा भीमा यदेति शुचतस्त आ धीः.
हेषस्वतः शुरुधो नायमक्तोः कुत्रा चिद्रण्वो वसतिर्वनेजाः.. (३)
हे सूर्यतुल्य एवं पापरहित दर्शन वाले अग्नि! तुम्हारी भयानक ज्वालाएं सभी जगह
जाती हैं. रात्रि में रंभाती हुई गाय के समान विस्तृत, सबके निवास एवं वन में उत्पन्न अग्नि
बहुत कम स्थानों में रमणीय होते हैं. (३)
तिग्मं चिदेम महि वर्पो अस्य भसदश्वो न यमसान असा.
विजेहमानः परशुर्न जिह्वां द्रविर्न द्रावयति दारु धक्षत्.. (४)
अग्नि का मार्ग तीक्ष्ण एवं रूप परम दीप्तिशाली है. वे घोड़ों के समान मुख से घास
आदि भक्षण करते हैं. वे फरसे के समान काठ पर अपनी जीभ चलाते हैं एवं सोने को गलाते
हुए सुनार के समान पिघला देते हैं. (४)
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