ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 897 of 1855
Read in contextबृहद्भिर्वाजैः स्थविरेभिरस्मे रेवद्भिरग्ने वितरं वि भाहि.. (११)
हे अग्नि! तुमने अपनी दीप्ति से धरती-आकाश को प्रकाशित किया है. तुम स्तुतियां
सुनकर रक्षा करते हो. तुम महान् अन्नों एवं प्रचुर धनों के साथ हमारे समीप प्रज्वलित बनो.
(११)
नृवद्द्वसो सदमिद्धेह्यस्मे भूरि तोकाय तनयाय पश्वः.
पूर्वीरिशो बृहतीरारेअघा अस्मे भद्रा सौश्रवसानि सन्तु.. (१२)
हे धनस्वामी अग्नि! हमें सेवकों सहित धन एवं हमारे पुत्र-पौत्रों को पशु दो. हमें
कामपूरक व पापरहित पर्याप्त अन्न एवं कल्याणकारी सौभाग्य दो. (१२)
पुरूण्यग्ने पुरुधा त्वाया वसूनि राजन्वसुता ते अश्याम्.
पुरूणि हि त्वे पुरुवार सन्त्यग्ने वसु विधते राजनि त्वे.. (१३)
हे धनयुक्त एवं तेजस्वी अग्नि! हम तुमसे अनेक प्रकार की संपत्ति प्राप्त करें. हे सर्वप्रिय
अग्नि! हम तुमसे बहुत से धन पावें. (१३)
सूक्त—२ देवता—अग्नि
त्वं हि क्षैतवद्यशोऽग्ने मित्रो न पत्यसे.
त्वं विचर्षणे श्रवो वसो पुष्टिं न पुष्यसि.. (१)
हे अग्नि! तुम सूखी लकड़ियों से युक्त हव्य पर मित्र के समान टूटते हो. हे सबको
विशेषरूप से देखने वाले एवं धनस्वामी अग्नि! हमारे अन्न और पुष्टि को बढ़ाओ. (१)
त्वां हि ष्मा चर्षणयो यज्ञेभिर्गीर्भिरीळते.
त्वां वाजी यात्यवृको रजस्तूर्विश्वचर्षणिः.. (२)
हे अग्नि! प्रजाजन यज्ञसाधन, हव्यों एवं स्तुतियों द्वारा तुम्हारी सेवा करते हैं. हिंसकों से
सुरक्षित, वर्षारूपी जल के प्रेरक एवं सर्वद्रष्टा सूर्य तुम्हारे समीप जाते हैं. (२)
सजोषस्त्वा दिवो नरो यज्ञस्य केतुमिन्धते.
यद्ध स्य मानुषो जनः सुम्नायुर्जुह्वे अध्वरे.. (३)
हे यज्ञ का संकेत करने वाले अग्नि! परस्पर प्रेम रखने वाले ऋत्विज् तुम्हें प्रज्वलित
करते हैं. मनु के वंशज यजमान सुख पाने की इच्छा से तुम्हें यज्ञ में बुलाते हैं. (३)
ऋधद्यास्ते सुदानवे धिया मर्तः शशमते.
ऊती ष बृहतो दिवो द्विषो अंहो न तरति.. (४)
ebook converter DEMO Watermarks*