Skip to content
SarvaKosh
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 868 of 1855

Read in context
Page 868

सामर्थ्य से आकाश से जल बरसाओ. (३)
माया वां मित्रावरुणा दिवि श्रिता सूर्यो ज्योतिश्चरति चित्रमायुधम्.
तमभ्रेण वृष्ट्या गूहथो दिवि पर्जन्य द्रप्सा मधुमन्त ईरते.. (४)
हे मित्र एवं वरुण! आकाश में यह तुम्हारी माया है, जो शोभन रूप वाले तुम्हारे आयुध
के रूप में तेजस्वी सूर्य विचरण करता है. तुम बादल और वर्षा द्वारा आकाश में सूर्य की रक्षा
करते हो. हे बादल! तुम मित्र एवं वरुण की प्रेरणा से मधुर जल बरसाते हो. (४)
रथं युञ्जते मरुतः शुभे सुखं शूरो न मित्रावरुणा गविष्टिषु.
रजांसि चित्रा वि चरन्ति तन्यवो दिवः सम्राजा पयसा न उक्षतम्.. (५)
हे मित्र व वरुण! युद्धार्थी शूर के समान मरुद्गण जलवर्षा करने के लिए तुम्हारी कृपा
से सुंदर द्वारों वाले रथ में घोड़े जोड़ते हैं एवं विभिन्न लोकों में घूमते हैं. हे भली प्रकार
सुशोभित मित्र एवं वरुण! तुम मरुतों के साथ हमारे कल्याण के लिए आकाश से वर्षा करो.
(५)
वाचं सु मित्रावरुणाविरावतीं पर्जन्यश्चित्रां वदति त्विषीमतीम्.
अभ्रा वसत मरुतः सु मायया द्यां वर्षयतमरुणामरेपसम्.. (६)
हे मित्र व वरुण! तुम्हारी कृपा से बादल अन्न का साधक, मनोहर एवं तेजस्वी गर्जन
करता है. मरुद्गण अपनी शोभन यात्रा द्वारा बादलों को ढक लेते हैं. तुम मरुद्गण के साथ
आकाश से लाल रंग की तथा दोषरहित वर्षा करते हो. (६)
धर्मणा मित्रावरुणा विपश्चिता व्रता रक्षेथे असुरस्य मायया.
ऋतेन विश्वं भुवनं वि राजथः सूर्यमा धत्थो दिवि चित्र्यं रथम्.. (७)
हे बुद्धिसंपन्न मित्र व वरुण! तुम वर्षा द्वारा यज्ञ की रक्षा करते हो एवं बादलों की माया
के कारण जल के द्वारा सारे संसार को सुशोभित बनाते हो. तुम गतिशील एवं पूज्य सूर्य को
आकाश में धारण करो. (७)
सूक्त—६४ देवता—मित्र व वरुण
वरुणं वो रिशादसमृचा मित्रं हवामहे. परि व्रजेव बाह्वोर्जगन्वांसा स्वर्णरम्.. (१)
हम इस मंत्र द्वारा शत्रुनाशक, स्वर्ग के नेता एवं बाहुबल से गोसमूह के समान आगे
बढ़ने वाले मित्र एवं वरुण का आह्वान करते हैं. (१)
ता बाहवा सुचेतुना प्र यन्तमस्मा अर्चते. शेव हिजार्यं वां विश्वांसु क्षासु जोगुवे.. (२)
ebook converter DEMO Watermarks*