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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 831 of 1855

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Page 831

हम शोभन स्तुतियों एवं हव्य द्वारा हिंसारहित धरती-आकाश को अन्न लाभ के निमित्त
प्रसन्न करना चाहते हैं. माता-पिता के समान, मधुर/वचनयुक्त एवं सुंदर हाथों वाले धरती-
आकाश समस्त संग्रामों में हमारी रक्षा करें. (२)
अध्वर्यवश्चकृवांसो मधूनि प्र वायवे भरत चारु शुक्रम्.
होतेव नः प्रथम पाह्यस्य देव मध्वो ररिमा ते मदाय.. (३)
हे अध्वर्युजनो! तुम मधुर आज्य एवं हव्य तैयार करके उत्तम सोमरस सबसे पहले
वायुदेव को प्रदान करो. हे वायुदेव! तुम भी होता की तरह इस सोम को सबसे पहले पिओ. हे
देव! यह सोम हम तुम्हारी प्रसन्नता के लिए दे रहे हैं. (३)
दश क्षिपो युञ्जते बाहू अद्रिं सोमस्य या शमितारा सुहस्ता.
मध्वो रसं सुगभस्तिर्गिरिष्ठां चनिश्चदद् दुदुहे शुक्रमंशुः.. (४)
ऋत्विजों की शीघ्रता करने वाली दस उंगलियां एवं सोमरस निचोड़ने वाले हाथ पत्थरों
को पकड़ते हैं. शोभन उंगलियों वाला ऋत्विज् प्रसन्न होता हुआ उच्च पर्वत पर उत्पन्न
सोमलता का मधुर रस टपकाता है. सोमलता से श्वेत रस निकलता है. (४)
असावि ते जुजुषाणाय सोमः क्रत्वे दक्षाय बृहते मदाय.
हरी रथे सुधुरा योगे अर्वागिन्द्र प्रिया कृणुहि हूयमानः.. (५)
हे सेवा करने वाले इंद्र! तुम्हारे कार्यों, शक्ति एवं महान् मद के कारण तुम्हारे लिए
सोमरस निचोड़ा गया है. हे इंद्र! हमारे द्वारा पुकारे जाने पर तुम सुंदर जुए में जुते हुए दोनों
घोड़ों को रथ में जोड़कर वह रथ हमारे सामने लाओ. (५)
आ नो महीमरमतिं सजोषा ग्नां देवीं नमसा रातहव्याम्.
मधोर्मदाय बृहतीमृतज्ञामाग्ने वह पथिभिर्देवयानैः.. (६)
हे अग्नि! तुम प्रसन्नतापूर्वक हमारे साथ देवों को प्राप्त होने वाले मार्गों द्वारा महान्,
सर्वत्र गमनशील, हव्यों के साथ यज्ञ को जानने वाली, हव्य प्राप्त करने वाली एवं विशाल गुना
देवी को सोमरस पीकर प्रसन्न होने के लिए हव्य वहन करो. (६)
अञ्जन्ति यं प्रथयन्तो न विप्रा वपावन्तं नाग्निना तपन्तः.
पितुर्न पुत्र उपसि प्रेष्ठ आ घर्मो अग्निमृतयन्नसादि.. (७)
मेधावी ऋत्विजों ने यज्ञ की कामना से हव्यपात्र अग्नि के ऊपर रख दिया है. वह ऐसा
जान पड़ता है कि पिता की गोद में पुत्र हो अथवा मोटा पशु आग में तपाया जा रहा हो. (७)
अच्छा मही बृहती शन्तमा गीर्दूतो न गन्त्वश्विना हुवध्यै.
मयोभुवा सरथा यातमर्वाग्गन्तं निधिं धुरमाणिर्न नाभिम्.. (८)
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