Skip to content
SarvaKosh
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 826 of 1855

Read in context
Page 826

वे अग्नि मेरे गमन के समय अपनी लपटों से मुझ पर क्रोध नहीं करते, अपितु प्रज्वलित
होकर जंगलों को जलाते हैं. (१०)
कथा महे रुद्रियाय ब्रवाम कद्राये चिकितुषे भगाय.
आप ओषधीरुत नोऽवन्तु द्यौर्वना गिरयो वृक्षकेशाः.. (११)
हम अत्रिगोत्र वाले ऋषि महान् रुद्र की स्तुति किस प्रकार करें? हम सर्वज्ञ भग से धन
पाने के लिए कौन सी स्तुति बोलें? वे पर्वत हमारी रक्षा करें, जिनके केश जल, ओषधियां,
घी, वन और वृक्ष हैं. (११)
शृणोतु न ऊर्जां पतिर्गिरः स नभस्तरीयाँ इषिरः परिज्मा.
शृण्वन्त्वापः पुरो न शुभ्राः परि स्रुचो बबृहाणस्याद्रेः.. (१२)
बल के स्वामी, आकाशचारी, अतिशय तरण वाले, गतिशील एवं चारों ओर जाने वाले
वायु हमारी स्तुतियां सुनें. नगरों के समान शुभ्र एवं विशाल पर्वत के चारों ओर वाली जलधारा
हमारी स्तुतियां सुने. (१२)
विदा चिन्नु महान्तो ये व एवा ब्रवाम दस्मा वार्यं दधानाः.
वयश्चन सुभ्व१ आव यन्ति क्षुभा मर्तमनुयतं वधस्नैः.. (१३)
हे महान् मरुतो! तुम हमारी स्तुतियों को शीघ्र जानो. हे दर्शनीय! हम सुंदर हव्य लेकर
तुम्हारी स्तुति करते हैं. मरुद्गण हमारे सामने भले बनकर आवें एवं हमारे प्रति क्षोभ रखने
वाले मरणधर्मा शत्रु को अपने आयुधों से मारें. (१३)
आ दैव्यानि पार्थिवानि जन्मापश्वाच्छा सुमखाय वोचम्.
वर्धन्तां द्यावो गिरश्चन्द्राग्रा उदा वर्धन्तामभिषाता अर्णाः.. (१४)
हम दिव्य-जन्म एवं पृथ्वी-संबंधी जल पाने के लिए सुंदर यज्ञ वाले मरुतों को आहुति
देते हैं. हमारी स्तुतियां अर्थ प्रकाशित करती हुई आनंदपूर्वक बढ़ें एवं मरुतों द्वारा पोषित
नदियां जल से पूर्ण हों. (१४)
पदेपदे मे जरिमा नि धायि वरूत्री वा शक्रा या पायुभिश्च.
सिषक्तु माता मही रसा नः स्मत्सूरिभिर्र्ऋजुहस्त ऋजुवनिः.. (१५)
हम सदा-सर्वदा उस भूमि की स्तुति करते हैं, जो शक्तिशालिनी, अपनी रक्षा शक्तियों
द्वारा हमारे उपद्रव निवारण करने वाली, सबका निर्माण करने वाली, महती एवं साररूप है.
वह प्रसिद्ध एवं मेधावी स्तोताओं के अनुकूल बनकर कल्याणकारिणी हो. (१५)
कथा दाशेम नमसा सुदानूनेवया मरुतो अच्छोक्तौ प्रश्रवसो मरुतो अच्छोक्तौ.
मा नोऽहिर्बुध्न्यो रिषे धादस्माकं भूदुपमातिवनिः.. (१६)
ebook converter DEMO Watermarks*