Skip to content
SarvaKosh
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 824 of 1855

Read in context
Page 824

ब्राह्मण अत्रि ने सूर्य को उपदेश दिया, इंद्र के निमित्त सोम निचोड़ने हेतु पत्थरों को
आपस में रगड़ा. स्तोत्रों द्वारा देवों की सेवा एवं अपने मंत्रों के बल से सूर्यरूपी नेत्र को
अंतरिक्ष में स्थापित किया. अत्रि ने स्वर्भानु की माया को दूर कर दिया. (८)
यं वै सूर्य स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः.
अत्रयस्तमन्वविन्दन्नह्य१न्ये अशक्नुवन्.. (९)
स्वर्भानु नामक असुर ने जिस सूर्य को अंधकार द्वारा जकड़ लिया था, अत्रि ने उसे
स्वतंत्र किया. अन्य किसी में इतनी शक्ति नहीं थी. (९)
सूक्त—४१ देवता—विश्वेदेव
को नु वां मित्रावरुणावृतायन्दिवो वा महः पार्थिवस्य वा दे.
ऋतस्य सा सदसि त्रासीथां नो यज्ञायते वा पशुषो न वाजान्.. (१)
हे मित्र एवं वरुण! मेरे अतिरिक्त कौन यजमान तुम्हारा यज्ञ करने की इच्छा कर सकता
है? तुम स्वर्ग, विशाल धरती एवं आकाश में रहकर हमारी रक्षा करते हो. यज्ञ करने वाले मुझ
यजमान को तुम पशु एवं अन्न दो तथा उनकी रक्षा करो. (१)
ते नो मित्रो वरुणो अर्यमायुरिन्द्र ऋभुक्षा मरुतो जुषन्त.
नमोभिर्वा ये दधते सुवृक्तिं स्तोमं रुद्राय मीळहुषे सजोषाः.. (२)
हे मित्र, वरुण, अर्यमा, आयु, इंद्र, ऋभुओ एवं मरुतो! तुम सब हमारे शोभन एवं
पापरहित स्तोत्रों तथा नमस्कारों को स्वीकार करो. दयालु रुद्र के साथ प्रसन्न होकर तुम
हमारी सेवा स्वीकार करो. (२)
आ वां येषाश्विना हुवध्यै वातस्य पत्मन्प्रथयस्य पुष्टौ.
उत वा दिवो असुराय मन्म प्रान्धांसीव यज्यवे भरध्वम्.. (३)
हे अभिलाषाओं का दमन करने वाले अश्विनीकुमारो! हम तुम्हें इस कारण पुकारते हैं
कि अपना रथ वायु के समान वेग से चलाओ. हे ऋत्विजो! तुम द्युतिशाली एवं प्राणहरण
करने वाले रुद्र के लिए सुंदर स्तोत्र एवं हव्य अन्न तैयार करो. (३)
प्र सक्षणो दिव्यः कण्वहोता त्रितो दिवः सजोषा वातो अग्निः.
पूषा भगः प्रभृथे विश्वभोजा आजिं न जग्मुराश्वश्वतमाः.. (४)
यज्ञ को स्वीकार करने वाले, मेधावियों द्वारा बुलाए गए, तीन स्थानों में उत्पन्न होकर भी
सूर्य के समान प्रसन्नता देने वाले एवं विश्वरक्षक वायु, अग्नि एवं पूषा देव हमारे यज्ञ में
आशुगामी अश्व के समान शीघ्र आवें. (४)
ebook converter DEMO Watermarks*