Skip to content
SarvaKosh
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 790 of 1855

Read in context
Page 790

सूक्त—१२ देवता—अग्नि
प्राग्नये बृहते यज्ञियाय ऋतस्य वृष्णे असुराय मन्म.
घृतं न यज्ञ आस्ये३ सुपूतं गिरं भरे वृषभाय प्रतीचीम्.. (१)
महान्, यज्ञ के योग्य, जल बरसाने वाले, शक्तिशाली एवं कामना पूर्ण करने वाले अग्नि
के मुख में यज्ञ करते समय जो घृत डाला है, हमारी स्तुतियां अग्नि को उसी के समान प्रसन्न
करें. (१)
ऋतं चिकित्त्व ऋतमिच्चिकिद्ध्युतस्य धारा अनु तृन्धि पूर्वीः.
नाहं यातुं सहसा न द्वयेन ऋतं सपाम्यरुषस्य वृष्णः.. (२)
हे अग्नि! हमारे द्वारा की गई स्तुति जानो, इन्हें स्वीकार करो तथा जल बरसाने के लिए
हमारे अनुकूल बनो. हम बल द्वारा यज्ञकर्म का विध्वंस नहीं करते और न कोई वेद-विरुद्ध
कार्य करते हैं. हम दीप्तिशाली एवं कामवर्षी अग्नि की स्तुति करते हैं. (२)
कया नो अग्न ऋतयन्नृतेन भुवो नवेदा उचथस्य नव्यः.
वेदा मे देव ऋतुपा ऋतूनां नाहं पतिं सनितुरस्य रायः.. (३)
हे अग्नि! तुम जल की वर्षा करते हुए किस शक्ति से हमारे यज्ञकर्म को जान लेते हो?
ऋतुओं की रक्षा करने वाले एवं दीप्तिशाली अग्नि हमें जानें. अग्नि मुझ भक्त के पशु आदि
के स्वामी हैं. इस बात को क्या मैं नहीं जानता? (३)
के ते अग्ने रिपवे बन्धनासः के पायवः सनिषन्त द्युमन्तः.
के धासिमग्ने अनृतस्य पान्ति क आसतो वचसः सन्ति गोपाः.. (४)
शत्रुओं का बंधन करने वाले, लोकरक्षक, दानशील एवं दीप्तिसंपन्न लोग कौन हैं? ये
सब अग्नि के सेवक हैं. असत्य धारण करने वाले का रक्षक एवं दुर्वचनों को आश्रय देने वाला
कौन है? अर्थात् अग्नि का कोई भक्त इस प्रकार का नहीं है. (४)
सखायस्ते विषुणा अग्न एते शिवासः सन्तो अशिवा अभूवन्.
अधूर्षत स्वयमेते वचोभिर्ऋजूयते वृजिनानि ब्रुवन्तः.. (५)
हे अग्नि! तुम्हारे स्तोता सब जगह फैले हुए हैं. ये पहले दुःखी थे, अब सुखी हुए हैं. हम
सरल आचरण करने वालों को जो दुर्वचन कहता था, वह हमारा शत्रु स्वयं नष्ट हो गया. (५)
यस्ते अग्ने नमसा यज्ञमीट ऋतं स पात्यरुषस्य वृष्णः.
तस्य क्षयः पृथुरा साधुरेतु प्रसर्साणस्य नहुषस्य शेषः.. (६)
हे दीप्तिशाली एवं कामवर्षी अग्नि! तुम्हारी स्तुति करने वाला तथा तुम्हारे निमित्त यज्ञ
ebook converter DEMO Watermarks*