ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 772 of 1855
Read in contextपंचम मंडल
सूक्त—१ देवता—अग्नि
अबोध्यग्निः समिधा जनानां प्रति धेनुमिवायतीमुषसम्.
यह्वाइव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सिस्रते नाकमच्छ.. (१)
गाय के समान आने वाली उषा के पश्चात् अध्वर्यु आदि की समिधाओं द्वारा अग्नि
प्रज्वलित होते हैं. अग्नि की शिखाएं महान् हैं. अग्नि विस्तृत शाखाओं वाले वृक्ष के समान
आकाश की ओर बढ़ते हैं. (१)
अबोधि होता यजथाय देवानूर्ध्वो अग्निः सुमनाः प्रातरस्थात्.
समिद्धस्य रुशददर्शि पाजो महान्देवस्तमसो निरमोचि.. (२)
होता अग्नि देवसंबंधीयज्ञ के निमित्त प्रज्वलित होते हैं. वे प्रातःकाल प्रसन्न मन से ऊपर
की ओर उठते हैं. प्रज्वलित अग्नि का तेजस्वी बल दिखाई देता है. इस प्रकार महान् देव तम
से मुक्त होते हैं. (२)
यदीं गणस्य रशनामजीगः शुचिरङ्क्ते शुचिभिर्गोभिरग्निः.
आद्दक्षिणा युज्यते वाजयन्त्युत्तानामूर्ध्वो अधयज्जुहूभिः.. (३)
रस्सी के समान संसार के व्यापारों को रोकने वाले अंधकार को अग्नि जब ग्रहण करते
हैं, तब वे दीप्त होकर उज्ज्वल किरणों से संसार को प्रकट करते हैं. इसके बाद अग्नि बढ़ी
हुई एवं अन्न की कामना करने वाली घृत धारा से मिलते हैं एवं ऊपर उठकर लपटों से उन्हें
पीते हैं. (३)
अग्निमच्छा देवयतां मनांसि चक्षूंषीव सूर्ये सं चरन्ति.
यदीं सुवाते उषसा विरूपे श्वेतो वाजी जायते अग्रे अह्नाम्.. (४)
यजमानों का मन उसी प्रकार अग्नि के सम्मुख जाता है, जिस प्रकार प्राणियों की आंखें
सूर्य की ओर जाती हैं. धरती-आकाश जब उषा के साथ अग्नि को उत्पन्न करते हैं, उस
प्रातःकाल में अग्नि उत्तमवर्ण वाले घोड़ों के समान उत्पन्न होते हैं. (४)
जनिष्ठ हि जेन्यो अग्रे अह्नां हितो हितेष्वरुषो वनेषु.
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