ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextअभिक्रम्याव जिघ्नतेऽपः सर्माय चोदयन्नर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (५)
क्रोध में भरे इंद्र वृत्र असुर के सामने जाकर उसे कंपाते हैं, उसकी उठी हुई ठोड़ी पर
वज्र का प्रहार करते हैं एवं अपने अधिकार का प्रदर्शन करते हुए वर्षा के जल को बहाते हैं.
(५)
अधि सानौ नि जिघ्नते वज्रेण शतपर्वणा.
मन्दान इन्द्रो अन्धसः सखिभ्यो गातुमिच्छत्यर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (६)
इंद्र शतधाराओं वाले वज्र से वृत्र असुर के उठे हुए कपोल पर आघात करते हैं एवं
अपना प्रभुत्व दिखाते हुए प्रसन्न होकर स्तोताओं के प्रति अन्न प्राप्ति के उपाय की इच्छा
करते हैं. (६)
इन्द्र तुभ्यमिदद्रिवोऽनुत्तं वज्रिन्वीर्यम्.
यद्ध त्यं मायिनं मृगं तमु त्वं माययावधीरर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (७)
हे मेघवाहन व वज्रधारी इंद्र! तुम्हारी ही सामर्थ्य शत्रुओं द्वारा अतिरस्कृत है, क्योंकि
तुमने अपना प्रभुत्व दिखाते हुए मृग रूपधारी वृत्र का माया द्वारा वध किया था. (७)
वि ते वज्रासो अस्थिरन्नवतिं नाव्या३ अनु.
महत्त इन्द्र वीर्यं बाह्वोस्ते बलं हितमर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (८)
हे इंद्र! तुम्हारा वज्र नब्बे नदियों के ऊपर व्यवस्थित हुआ था. तुम अपने पर्याप्त वीर्य
एवं बलशालिनी भुजाओं से अपना प्रभुत्व प्रदर्शित करो. (८)
सहस्रं साकमर्चत परि ष्टोभत विंशतिः.
शतैनमन्वनोनवुरिन्द्राय ब्रह्मोद्यतमर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (९)
हजार मनुष्यों ने एक साथ इंद्र की पूजा एवं बीस ने स्तुति की थी. सौ ऋषियों ने इंद्र की
बार-बार स्तुति की थी. इंद्र के निमित्त हव्य अन्न सबसे ऊपर रखा गया था, इसीलिए इंद्र ने
अपना अधिकार प्रदर्शित किया. (९)
इन्द्रो वृत्रस्य तविषीं निरहन्सहसा सहः.
महत्तदस्य पौंस्यं वृत्रं जघन्वाँ असृजदर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (१०)
इंद्र ने वृत्र राक्षस का बल अपने बल से नष्ट किया एवं अभिभव के साधन आयुधों से
वृत्र के आयुध समाप्त किए. इंद्र का बल अति प्रौढ़ है, क्योंकि उन्होंने वृत्र को मारकर उसके
द्वारा रोका हुआ जल बहाया एवं अपने प्रभुत्व का प्रदर्शन किया. (१०)
इमे चित्तव मन्यवे वेपेते भियसा मही.