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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1836 of 1855

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Page 1836

हे नारी! जो राक्षसादि स्वप्न या सुषुप्ति की अवस्था में तुम्हें मोहित करके तुम्हारे पास
जाता है एवं तुम्हारी संतान को मारना चाहता है, उसे हम यहां से दूर भगाते हैं. (६)
सूक्त—१६३ देवता—यक्ष्मा का नाश
अक्षीभ्यां ते नासिकाभ्यां कर्णाभ्यां छुबुकादधि.
यक्ष्मं शीर्षण्यं मस्तिष्काज्जिह्वाया वि वृहामि ते.. (१)
हे रोगी! तुम्हारी दोनों आंखों, नाक, कानों, ठोड़ी, शीश, मस्तिष्क एवं जीभ से मैं यक्ष्मा
रोग को बाहर निकालता हूं. (१)
ग्रीवाभ्यस्त उष्णिहाभ्यः कीकसाभ्यो अनूक्यात्.
यक्ष्मं दोषण्य१मंसाभ्यां बाहुभ्यां वि वृहामि ते.. (२)
हे रोगी! मैं तुम्हारी गरदन की नसों, नाड़ियों, हड्डियों के जोड़ों, हाथों और कंधों से
यक्ष्मा के दूषित रोग को दूर भगाता हूं. (२)
आन्त्रेभ्यस्ते गुदाभ्यो वनिष्ठोर्हृदयादधि.
यक्ष्मं मतस्नाभ्यां यक्नः प्लाशिभ्यो वि वृहामि ते.. (३)
हे रोगी! मैं तुम्हारी आंतों, गुदा, बड़ी आंत, हृदय, गुर्दों, जिगर एवं अन्य अंगों से यक्ष्मा
रोग को बाहर निकालता हूं. (३)
ऊरुभ्यां ते अष्ठीवद्भ्यां पार्ष्णिभ्यां प्रपदाभ्याम्.
यक्ष्मं श्रोणिभ्यां भासदाद्बंघससो वि वृहामि ते.. (४)
हे रोगी! मैं तुम्हारी जंघाओं, घुटनों, टखनों, पंजों, नितंबों, कमर एवं गुदा से यक्ष्मा रोग
को बाहर निकालता हूं. (४)
मेहनाद्वनंकरणाल्लोमभ्यस्ते नखेभ्यः.
यक्ष्मं सर्वस्मादात्मनस्तमिदं वि वृहामि ते.. (५)
हे रोगी! मैं तुम्हारी मूत्रेंद्रिय, बालों, नाखूनों आदि शरीर के सभी भागों से यक्ष्मा रोग को
बाहर निकालता हूं. (५)
अङ्गादङ्गाल्लोम्नोलोम्नो जातं पर्वणिपर्वणि.
यक्ष्मं सर्वस्मादात्मनस्तमिदं वि वृहामि ते.. (६)
हे रोगी! मैं तुम्हारे प्रत्येक अंग, प्रत्येक रोम, प्रत्येक जोड़ एवं अंग के किसी भी भाग में
स्थित रोग को बाहर निकालता हूं. (६)
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