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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1831 of 1855

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Page 1831

हे अग्नि! तुम सदा चलने वाले जरारहित तथा लोगों को प्रकाश देने वाले सूर्य को
आकाश में स्थित करो. (४)
अग्ने केतुर्विशामसि प्रेष्ठः श्रेष्ठ उपस्थसत्. बोधा स्तोत्रे वयो दधत्.. (५)
हे अग्नि! तुम प्रजाओं का ज्ञान कराने वाले, अतिशय प्रिय एवं श्रेष्ठ हो. तुम यज्ञशाला में
बैठो, स्तुतियां और अन्न धारण करो. (५)
सूक्त—१५७ देवता—विश्वेदेव
इमा नु कं भुवना सीषधामेन्द्रश्च विश्वे च देवा:.. (१)
हम सारे लोकों को शीघ्र ही वश में करें तथा इंद्र एवं सभी देवों द्वारा सुख प्राप्त करें.
(१)
यज्ञं च नस्तन्वं च प्रजां चादित्यैरिन्द्रः सह चीक्लृपाति.. (२)
इंद्र आदित्यों के साथ मिलकर हमारे यज्ञ, शरीर और प्रजा की रक्षा करें. (२)
आदित्यैरिन्द्रः सगणो मरुद्भिरस्माकं भूत्वविता तनूनाम्.. (३)
हे इंद्र! तुम आदित्यों और मरुतों की सहायता लेकर हमारे शरीरों के रक्षक बनो. (३)
हत्वाय देवा असुरान्यदायन्देवा देवत्वमभिरक्षमाणा:.. (४)
देवगण शत्रुओं को मारकर जब लौटे, तब उनकी अमरता की रक्षा हुई. (४)
प्रत्यञ्चमर्कमनयञ्छचीभिरादित्स्वधामिषिरां पर्यपश्यन्.. (५)
स्तोताओं ने सेवाओं के साथ स्तुतियों को इंद्र के समीप भेजा. इसके बाद उन्होंने
आकाश से होने वाली वर्षा देखी. (५)
सूक्त—१५८ देवता—सूर्य
सूर्यो नो दिवस्पातु वातो अन्तरिक्षात्. अग्निर्नः पार्थिवेभ्य:.. (१)
सूर्य द्युलोक की बाधाओं से, वायु अंतरिक्ष की बाधाओं से तथा अग्नि पृथ्वी की
बाधाओं से हमारी रक्षा करें. (१)
जोषा सवितर्यस्य ते हरः शतं सवाँ अर्हति. पाहि नो दिद्युतः पतन्त्या:.. (२)
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