ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1798 of 1855
Read in contextमैं रुद्रों, वसुओं, आदित्यों एवं सभी देवों के साथ विचरण करती हूं. मैं मित्र, वरुण, इंद्र,
अग्नि एवं अश्विनीकुमारों को धारण करती हूं. (१)
अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्.
अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये३यजमानाय सुन्वते.. (२)
मैं पत्थर से पीसे जाने वाले सोम, त्वष्टा, पूषा एवं भग को धारण करती हूं. मैं हव्य
धारण करने वाले, देवों को शोभन हवि देने वाले एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को धन
देती हूं. (२)
अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्.
तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम्.. (३)
मैं राष्ट्र की स्वामिनी, धन देने वाली, ज्ञान वाली एवं यज्ञोपयोगी वस्तुओं में सर्वोत्तम हूं.
देवों ने मुझे अनेक स्थानों में धारण किया है. मेरा आधार विशाल है. मैं अनेक प्राणियों में
आविष्ट हूं. (३)
मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम्.
अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि.. (४)
मेरी सहायता से ही प्राणी अन्न खाते हैं, देखते हैं, सांस लेते हैं एवं कही हुई बात सुनते
हैं. मुझे न मानने वाले क्षीण हो जाते हैं. हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें श्रद्धा करने योग्य बात बताती
हूं. (४)
अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः.
यं कामये तंतमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्.. (५)
जो व्यक्ति देवों एवं मानवों द्वारा सेवित है, उसे मैं ही उपदेश देती हूं. मैं जिसे चाहती हूं,
उसे शक्तिशाली, स्तोता, ऋषि एवं बुद्धिमान् बना देती हूं. (५)
अहं रुद्राय धनुरा तनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ.
अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश.. (६)
मैं ब्रह्मद्वेषी त्रिपुर राक्षस को मारने के लिए ही रुद्र के धनुष का विस्तार करती हूं. मैं ही
लोगों के कल्याण के लिए युद्ध करती हूं एवं द्यावा-पृथिवी में व्याप्त हूं. (६)
अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्व१न्तः समुद्रे.
ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वोतामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि.. (७)
मैं द्यौ को उत्पन्न करती हूं. आकाश परमात्मा का मस्तक है. मेरा स्थान सागर के जल
ebook converter DEMO Watermarks*