ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1795 of 1855
Read in contextऋतस्य सानावधि विष्टपि भ्राट् समानं योनिमभ्यनूषत व्राः.. (२)
वेन आकाश से जल की लहरों को गिराते हैं. आकाश में उज्ज्वल मूर्ति वाले वेन की
पीठ दिखाई देती है. वेन जल के ऊंचे स्थान आकाश में दीप्ति पाते हैं. वेन के अनुचरों ने
उनके उत्पत्तिस्थान आकाश को शब्द से भर दिया है. (२)
समानं पूर्वीरभि वावशानास्तिष्ठन्वत्सस्य मातरः सनीळाः.
ऋतस्य सानावधि चक्रमाणा रिहन्ति मध्वो अमृतस्य वाणीः.. (३)
चारों ओर शब्द करते हुए व बछड़े के समान विद्युत्-अग्नि की माता तुल्य जल वेन के
साथ आकाश में स्थिर रहता है. जल के उत्पत्तिस्थान उच्च आकाश में बहते हुए मधुर जल
का शब्द वेन को अलंकृत करता है. (३)
जानन्तो रूपमकृपन्त विप्रा मृगस्य घोषं महिषस्य हि ग्मन्.
ऋतेन यन्तो अधि सिन्धुमस्थुर्विदद्गन्धर्वो अमृतानि नाम.. (४)
मेधावियों ने महान् पशु के समान शब्द सुनकर वेन के रूप की कल्पना की. उन्होंने यज्ञ
से वेन को तृप्त करके जलसमूह को प्राप्त किया. जल के स्वामी वेन मरणरहित हैं. (४)
अप्सरा जारमुपसिष्मियाणा योषा बिभर्ति परमे व्योमन्.
चरत्प्रियस्य योनिषु प्रियः सन्तसीदत्पक्षे हिरण्यये स वेनः.. (५)
विद्युतरूपी स्त्री ने वेनरूपी पुरुष को देखकर मुसकुराते हुए उनका अंतरिक्ष में
आलिंगन किया. वेन ने प्रेमी के समान प्रेयसीरूपिणी बिजली की अभिलाषा पूरी करके सोने
के कक्ष में शयन किया. (५)
नाके सुपर्णमुप यत्पतन्तं हृदा वेनन्तो अभ्यचक्षत त्वा.
हिरण्यपक्षं वरुणस्य दूतं यमस्य योनौ शकुनं भुरण्युम्.. (६)
हे वेन! तुम सुनहरे पंखों वाले पक्षी के समान, स्वर्ग में उड़ने वाले, वरुण के दूत, विद्युत्-
अग्नि के स्थान अंतरिक्ष में पक्षीरूप में वर्तमान एवं विश्व का भरण करने वाले हो. सब लोग
हृदय में प्रेम रखते हुए तुम्हें देखते हैं. (६)
ऊर्ध्वो गन्धर्वो अधि नाके अस्थात्प्रत्यङ्चित्रा बिभ्रदस्यायुधानि.
वसानो अतकं सुरभिं दृशे कं स्वर्ण नाम जनत प्रियाणि.. (७)
वेन जल धारण करने वाले एवं स्वर्ग के ऊंचे स्थान में रहते हैं एवं अपने चारों ओर
विचित्र आयुध धारण करते हैं. वे सूर्य के समान अपने सुंदररूप में चमकते हैं एवं सबके
अनुकूल जलों को उत्पन्न करते हैं. (७)
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