ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextगिरा च श्रुष्टिः सभरा असन्नो नेदीय इत्सृण्यः पक्वमेयात्.. (३)
हे मित्र ऋत्विजो! हलों में बैल जोड़ो, जुओं को विस्तृत करो व यहां प्रस्तुत खेत में बीज
बोओ. हमारी स्तुतियों के साथ अन्न पर्याप्त मात्रा में हो. हमारा हंसिया समीप की पकी हुई
फसल पर गिरे. (३)
सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वि तन्वते पृथक्. धीरा देवेषु सुम्नया.. (४)
बुद्धिमान् ऋत्विज् हल जोड़ते हैं एवं जुआ हल से अलग करते हैं. धीर पुरुष देवों का
स्तोत्र बोलते हैं. (४)
निराहावान्कृणोतन सं वरत्रा दधातन.
सिञ्चामहा अवतमुद्रिणं वयं सुषेकमनुपक्षितम्.. (५)
हे मित्रो! पशुओं के लिए प्याऊ एवं चमड़े की रस्सी बनाओ. हम जलयुक्त सींचने में
समर्थ एवं क्षीण न होने वाले गड्ढे से पानी लेकर सींचते हैं. (५)
इष्कृताहावमवतं सुवरत्रं सुषेचनम्. उद्रिणं सिञ्चे अक्षितम्.. (६)
हम चमड़े की शोभन रस्सियों से युक्त भली प्रकार सिंचित, जल से भरे हुए एवं न
सूखने वाले गड्ढे से जल लेकर सींचते हैं. (६)
प्रीणीताश्वान्हितं जयाथ स्वस्तिवाहं रथमित्कृणुध्वम्.
द्रोणाहावमवतमश्मचक्रमंसत्रकोशं सिञ्चता नृपाणम्.. (७)
हे ऋत्विजो! बैलों को घास आदि खिलाकर तैयार करो, खेतों को जोतो एवं सरलता से
धान्य ढोने वाला रथ तैयार करो. पशुओं की प्याऊ में एक द्रोण जल आता है. पत्थरों के घेरे
से घिरे हुए दुर्भिक्ष के समय जल की रक्षा करने वाले तथा मानवों के जलपान के आधार
अर्थात् कुएं को पानी से भरो. (७)
व्रजं कृणुध्वं स हि वो नृपाणो वर्म सीव्यध्वं बहुला पृथूनि.
पुरः कृणुध्वमायसीरधृष्टा मा वः सुस्रोच्चमसो दृंहता तम्.. (८)
हे ऋत्विजो! गोशाला बनाओ. वही मानवों के जल पीने का स्थान है. तुम मानवों के
कवचों को सिओ, जो अनेक एवं विस्तृत हों. तुम लोहे के मजबूत बरतन बनाओ तथा चमस
को दृढ़ करो, जिससे पानी न टपके. (८)
आ वो धियं यज्ञियां वर्त ऊतये देवा देवीं यजतां यज्ञियामिह.
सा नो दुहीयद्यवसेव गत्वी सहस्रधारा पयसा मही गौः.. (९)
हे ऋत्विजो! मैं अपनी रक्षा के निमित्त तुम्हारा ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करता हूं.
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