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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1755 of 1855

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Page 1755

इन्द्रो अस्मे सुमना अस्तु विश्वहा राजा सोमः सुवितस्याध्येतु नः.
यथायथा मित्रधितानि संदधुरा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (४)
इंद्र हमारे प्रति अनुग्रहपूर्ण चित्त वाले बनें. सब दिनों में दीप्तिशाली सोम हमारे स्तोत्र
को प्राप्त करें. इंद्र ऐसी कृपा करें कि हम मित्रों में निहित धन पा सकें. मैं सबकी रक्षा करने
वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (४)
इन्द्र उक्थेन शवसा परुर्दधे बृहस्पते प्रतरीतास्यायुषः.
यज्ञो मनुः प्रमतिर्नः पिता हि कमा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (५)
ये इंद्र प्रशंसनीय बल द्वारा हमारे यज्ञ को धारण करते हैं. हे बृहस्पति! तुम मेरी आयु
बढ़ाने वाले बनो. मानयुक्त एवं उत्तम बुद्धिवाला यज्ञ हमारा पालक बनकर हमें सुख प्रदान
करे. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (५)
इन्द्रस्य नु सुकृतं दैव्यं सहोऽग्निर्गृहे जरिता मेधिरः कविः.
यज्ञश्च भूद्धिदथे चारुरन्तम आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (६)
देवों का बल इंद्र भली प्रकार संपादित करके एवं हमारी यज्ञशाला में वर्तमान है. अग्नि
देवों को बुलाने वाले बुद्धिमान्, विद्वान् व यज्ञ के पात्र एवं यज्ञ में हमारे सेव्य हैं. (६)
न वो गुहा चकृम भूरि दुष्कृतं नाविष्यं वसवो देवहेळनम्.
माकिर्नो देवा अनृतस्य वर्पस आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (७)
हे देवो! हम तुम्हारे प्रच्छन्न स्थान में पाप न करें. हे वासदाता देवो! हम तुम्हारे क्रोध के
निमित्त द्रोह न करें. हमें झूठे रूप की प्राप्ति न हो. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता
अदिति का वरण करता हूं. (७)
अपामीवां सविता साविषन्य१ग्वरीय इदप सेधन्त्वद्रयः.
ग्रावा यत्र मधुषुदुच्यते बृहदा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (८)
सविता देव हमारे रोगों को दूर करें तथा शक्तिशाली पाप को नीचे गिरावें. जिस स्थान
पर सोमरस निचोड़ा जाता है, उस स्थान पर पाप नष्ट हो. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता
अदिति का वरण करता हूं. (८)
ऊर्ध्वो ग्रावा वसवोऽस्तु सोतरि विश्वा द्वेषांसि सनुतर्युयोत.
स नो देवः सविता पायुरुीड्य आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (९)
हे देवो! मुझ सोमरस निचोड़ने वाले का पत्थर ऊंचा हो. तुम उसी पत्थर से सब छिपे
हुए शत्रुओं को हमसे अलग करो. वे सविता देव हमारे पालक एवं प्रशंसनीय हैं. मैं सबकी
रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (९)
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