ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1742 of 1855
Read in contextचाहती तो समीपवर्ती कक्ष से पति के रात में सोने वाले कमरे में जाती तथा रात-दिन अपने
पति के साथ रमणसुख भोगती।” (४)
त्रिः स्म माह्नः श्नथयो वैतसेनोत स्म मेऽव्यत्यै पृणासि.
पुरूरवोऽनु ते केतमायं राजा मे वीर तन्व१स्तदासीः.. (५)
हे पुरूरवा! तुम दिन में तीन बार पुरुष इंद्रिय द्वारा ताडित करते थे. किसी सौत के साथ
मेरी होड़ नहीं थी. मैं प्रतिदिन तुम्हारे शयनकक्ष में आती थी. हे वीर राजा! तुम मेरे शरीर को
सुख देते थे.” (५)
या सुजूर्णिः श्रेणिः सुम्नआपिर्ह्र्देचक्षुर्न ग्रन्थिनी चरण्युः.
ता अज्ज्योऽरुणयो न सस्रुः श्रिये गावो न धेनवोऽनवन्त.. (६)
पुरूरवा ने कहा—“मेरे महल में तुम्हारे आने के बाद सुजूर्णि, श्रेणि, सुम्न, आपि,
हृदेचक्षु, ग्रन्थिनी, चरण्यू आदि अप्सराएं गोष्ठ में जाने वाली गायों के समान शब्द करती हुई
नहीं आती थीं.” (६)
समस्मिञ्जायमान आसत ग्ना उतेमवर्धनन्नद्य१ः स्वगूर्ताः.
महे यत्त्वा पुरूरवो रणायावर्धयन्दस्युहत्याय देवाः.. (७)
उर्वशी ने कहा—“पुरूरवा के जन्म के समय देखने के लिए देवपत्नियां भी एकत्रित हुईं
तथा स्वयं बहने वाली नदियों ने भी उसे आश्रित बनकर बढ़ाया. देवों ने युद्ध में शत्रुहनन
करने के लिए तुम्हारी अत्यंत वृद्धि की.” (७)
सचा यदासु जहतीष्वत्कममानुषीषु मानुषो निषेवे.
अप स्म मत्तरसन्ती न भुज्युस्ता अत्रसन्न्रथस्पृशो नाश्वाः.. (८)
पुरूरवा ने कहा—“मानव रूपधारी पुरूरवा जब अमानुष रूपधारिणी अप्सराओं के
सामने गए, तब वे इस प्रकार भाग गईं, जिस प्रकार हिरनी व्याध से दूर भागती है अथवा रथ
में जुते हुए घोड़े भागते हैं. (८)
यदासु मर्तो अमृतासु निस्पृक्सं क्षोणीभिः ऋतुभिर्न पृङ्क्ते.
ता आतयो न तन्वः शुम्भत स्वा अश्वासो न क्रीळयो दन्दशानाः.. (९)
जब मानव पुरूरवा ने मरणरहित अप्सराओं को विशेषरूप से स्पर्श करते हुए वचन
और कर्म से उनके साथ संपर्क स्थापित किया, तब वे क्रीड़ारत अश्वों के समान शब्द करके
भाग गईं और दिखाई नहीं दीं. (९)
विद्युन्न या पतन्ती दविद्योद्भरन्ती मे अप्या काम्यानि.
जनिष्टो अपो नर्यः सुजातः प्रोर्वशी तिरत दीर्घमायुः.. (१०)
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