ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextफैलाने वाली है. इंद्र सबसे उत्तम हैं.” (६)
उवे अम्ब सुलाभिके यथेवाङ्ग भविष्यति.
भसन्मे अम्ब सक्थि मे शिरो मे वीव हृष्यति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (७)
वृषाकपि ने कहा— “हे सुंदर लाभ प्रदान करने वाली माता! जैसे तुमने कहा है कि
तुम्हारी जंघाएं शिर आदि अंग उसी प्रकार के हो जाएंगे. तुम कोयल के समान प्रिय वचन
बोलकर पिता को प्रसन्न करो. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (७)
किं सुबाहो स्वङ्गुरॆ पृथुष्टो पृथुजाघने.
किं शूरपत्नि नस्त्वमभ्यमीषि वृषाकपिं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (८)
इंद्र ने कहा— “हे सुंदर भुजाओं, शोभन उंगलियों, लंबे बालों व विस्तृत जंघाओं वाली
एवं वीरपत्नी इंद्राणी! तुम वृषाकपि के प्रति व्यर्थ क्यों क्रोध कर रही हो? इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.”
(८)
अवीरामिव मामयं शरारुरभि मन्यते.
उताहमस्मि वीरिणीन्द्रपत्नी मरुत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (९)
इंद्राणी ने कहा— “यह घातक वृषाकपि मुझे पतिहीना के समान समझता है. मैं
इंद्रपत्नी वीर पुत्रों वाली एवं मरुतों की सखा हूं. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (९)
संहोत्रं स्म पुरा नारी समनं वाव गच्छति.
वेधा ऋतस्य वीरिणीन्द्रपत्नी महीयते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१०)
“नारी सत्य की विधात्री व वीरमाता इंद्रपत्नी यज्ञ या युद्ध के समय वहां जाती है एवं
सबका आदर पाती है. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (१०)
इन्द्राणीमासु नारिषु सुभगामहमश्रवम्.
नह्यस्या अपरं चन जरसा मरते पतिर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (११)
इंद्र ने कहा— “मैंने इन सब स्त्रियों में इंद्राणी को सौभाग्य वाली सुना है. इसका पति
अन्य नारियों के समान बुढ़ापे से नहीं मरता. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (११)
नाहमिन्द्राणि रारण सख्युर्वृषाकपेर्ऋते.
यस्येदमप्यं हविः प्रियं देवेषु गच्छति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१२)
“हे इंद्राणी! मैं अपने मित्र वृषाकपि के बिना प्रसन्न नहीं रह सकता. उसीको प्रसन्न
करने वाला हवि देवों के समीप जाता है. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (१२)
वृषाकपायि रेवति सुपुत्र आद् सुस्नुषे.
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