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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1634 of 1855

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Page 1634

बढ़ाने में तुम्हीं समर्थ हो. (४)
गमन्नस्मे वसून्या हि शंसिषं स्वाशिषं भरमा याहि सोमिनः.
त्वमीशिषे सास्मिन्ना सत्सि बर्हिष्यनाधृष्या तव पात्राणि धर्मणा.. (५)
हे इंद्र! मैं तुम्हारी स्तुति करता हूं, इसलिए सारी संपत्ति मेरे पास आवे. तुम मुझ सोमरस
वाले के शोभन यज्ञ में आओ. तुम धन के स्वामी हो. तुम इन बिछे हुए कुशों पर बैठो. तुम्हारे
सोमरस के पात्रों को राक्षस छू भी नहीं सकते. (५)
पृथक् प्रायन्प्रथमा देवहूतयोऽकृण्वत श्रवस्यानि दुष्टरा.
न ये शेकुर्यज्ञियां नावमारुहमीरमैव ते न्यविशन्त केपयः.. (६)
हे इंद्र! जो प्रमुख एवं देवों को बुलाने वाले लोग तुम्हारी कृपा से अलग-अलग स्वर्ग में
गए, उन्होंने अन्यों द्वारा यश के कार्य किए थे. जो यज्ञरूप नाव पर नहीं चढ़ सके, वे
पापकर्मा, ऋणयुक्त एवं नीच बने रहते हैं. (६)
एवैवापागपरे सन्तु दूढ्योऽश्वा येषां दुर्युज आयुयुज्रे.
इत्था ये प्रागुपरे सन्ति दावने पुरूणि यत्र वयुनानि भोजना.. (७)
जो लोग इसी प्रकार दुर्बुद्धि एवं यज्ञरहित हैं, वे अधोगामी रहें. जिन यज्ञ न करने वालों
के शक्तिशाली घोड़े रथ में जुड़ते हैं, वे नरक में जाते हैं. जो मरने से पहले ही देवों को हव्य
देते हैं, वे स्वर्ग में जाते हैं. स्वर्ग में शोभन वस्तुएं अधिक मात्रा में रहती हैं. (७)
गिरीँरञ्जान्रेजमानाँ अधारयद् द्यौः क्रन्ददन्तरिक्षाणि कोपयत्.
समीचीने धिषणे वि ष्कभायति वृष्णः पीत्वा मद उक्थानि शंसति.. (८)
इंद्र ने पेट भरने वाले सोम को पीकर गमनशील एवं कांपने वाले मेघों को स्थिर किया.
उस समय स्वर्ग क्रंदन करने लगा और अंतरिक्ष कुपित हो उठे. इंद्र परस्पर मिली हुई द्यावा-
पृथिवी को उसी दशा में रखते हैं. (८)
इमं बिभर्मि सुकृतं ते अङ्कुशं येनारुजासि मघवञ्छफारुजः.
अस्मिन्त्सु ते सवने अस्तवोक्यं सुत इष्टौ मघवन्बोध्याभगः.. (९)
हे धनस्वामी इंद्र! मैं तुम्हारे लिए स्तुतिरूपी शोभन अंकुश धारण करता हूं. इससे प्रेरित
होकर तुम शत्रुसेना को नष्ट करने वाले अपने हाथियों को कोंचते हो. इस सोमयाग में तुम्हारा
निवास हो. तुम सेवनीय बनकर यज्ञ में हमारी स्तुतियां सुनो. (९)
गोभिष्टरेमाममतिं दुरेवां यवेन क्षुधं पुरुहूत विश्वाम्.
वयं राजभिः प्रथमा धनान्यस्माकेन वृजनेना जयेम.. (१०)