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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1626 of 1855

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Page 1626

सूक्त—४० देवता—अश्विनीकुमार
रथं यान्तं कुह को ह वां नरा प्रति द्युमन्तं सुविताय भूषति.
प्रातर्यावाणं विभ्वं विशेविशे वस्तोर्वस्तोर्वहमानं धिया शमि.. (१)
हे यज्ञों के नेता अश्विनीकुमारो! तुम्हारे दीप्तिशाली यज्ञ की ओर प्रातःकाल चलने वाले,
व्याप्त, सब मनुष्यों के पास प्रतिदिन धन पहुंचाने वाले एवं गतिशील रथ की पूजा मेरे समान
किस यजमान ने कहां की है? (१)
कुह स्विद्दोषा कुह वस्तोरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहोषितः.
को वां शयुत्रा विधवेव देवरं मर्यं न योषा कृणुते सधस्थ आ.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम रात और दिन में कहां रहते हो? तुम्हारा समय कहां बीतता है?
तुम कहां निवास करते हो? जिस प्रकार विधवा अपने देवर को और सधवा अपने पति को
चारपाई पर बुलाती है, उसी प्रकार मेरे अतिरिक्त कौन यजमान तुम्हें यज्ञवेदी पर अपने
अनुकूल बनाता है? (२)
प्रातर्जरिथे जरणेव कापथा वस्तीर्वस्तोर्यजता गच्छथो गृहम्.
कस्य ध्वस्रा भवतः कस्य वा नरा राजपुत्रेव सवनाव गच्छथः.. (३)
हे यज्ञों के नेता अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार प्रातःकाल परम ऐश्वर्य वाले राजाओं को
जगाया जाता है, उसी प्रकार तुम्हें प्रातःकाल जगाने के लिए स्तुतियां पढ़ी जाती हैं. हे यज्ञ के
योग्य अश्विनीकुमारो! तुम प्रतिदिन यजमान के घर जाते हो. तुम किस यजमान के दोष
समाप्त करते हो एवं राजकुमारों के साथ किसके यज्ञ में जाते हो? (३)
युवां मृगेव वारणा मृगण्यवो दोषा वस्तोर्हविषा नि ह्वयामहे.
युवं होत्रामृतुथा जुह्वते नरेषं जनाय वहथः शुभस्पती.. (४)
हे वरण करने वाले अश्विनीकुमारो! बहेलिए जिस प्रकार शार्दूल की इच्छा करते हैं, उसी
प्रकार हव्य लेकर मैं तुम्हें रात-दिन बुलाता हूं. हे यज्ञ के नेता अश्विनीकुमारो! यजमान समय-
समय पर तुम्हारे लिए आहुति देते हैं. तुम वर्षा के जल के स्वामी होने के कारण यजमानों के
लिए अन्न देते हो. (४)
युवां ह घोषा पर्यश्विना यती राज्ञ ऊचे दुहिता पृच्छे वां नरा.
भूतं मे अह्न उत भूतमक्तवेऽश्वावते रथिने शक्तमर्वते.. (५)
हे यज्ञ के नेता अश्विनीकुमारो! राजा कक्षीवान् की पुत्री मैं घोषा इधर-उधर दौड़कर
तुम्हारी बात करती हूं एवं तुम्हारे ही विषय में पूछती हूं. तुम रात-दिन मेरे यहां रहो एवं अश्व व
रथ से युक्त मेरे भतीजे को यहां से निकाल दो. (५)
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