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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1585 of 1855

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Page 1585

उत्त स्तभ्नामि पृथिवीं त्वत्परीमं लोगं निदधन्मो अहं रिषम्.
एतां स्थूणां पितरो धारयन्तु तेऽत्रा यमः सादना ते मिनोतु.. (१३)
हे हड्डियों से पूर्ण घट! मैं तुम्हारे ऊपर धरती को उठाकर रखता हूं. तुम्हारे ऊपर मैं
पत्थर रखता हूं, जिससे मिट्टी गिरकर तुम्हें नष्ट न करे. पितर लोग तुम्हारी इस खूंटी को
धारण करें, जिसे गाड़कर मैंने तुम्हें बांधा है. यम यहां तुम्हारा स्थान स्वीकार करें. (१३)
प्रतीचीने मामहनीष्वाः पर्णमिवा दधुः. प्रतीचीं जग्रभा वाचमश्वं रशनया यथा.. (१४)
हे प्रजापति! जिस प्रकार बाण के पिछले भाग में पंख लगाये जाते हैं, उसी प्रकार मुझ
संकुसुक ऋषि को देवों ने संवत्सर के पूज्य दिन के रूप में रखा है. घोड़ों को जिस प्रकार
लगाम के सहारे रोका जाता है, उसी प्रकार तुम मेरी पूज्य स्तुति को स्वीकार करो. (१४)
सूक्त—१९ देवता—गौ
नि वर्तध्वं मानु गातास्मान्तिषिक्त रेवतीः.
अग्नीषोमा पुनर्वसू अस्मे धारयतं रयिम्.. (१)
हे गायो! तुम हमारे पास लौट आओ. तुम हमारे अतिरिक्त किसी के पास मत जाओ. हे
धनयुक्त गायो! तुम हमें दूध से सींचो. हे बार-बार धन देने वाले अग्नि और सोम! तुम हमें धन
दो. (१)
पुनरेना नि वर्तय पुनरेना न्या कुरु. इन्द्र एणा नि यच्छत्वग्निरेना उपाजतु.. (२)
हे मेरी आत्मा! इन गायों को बार-बार अपनी ओर मोड़ो और बार-बार वश में करो. इंद्र
इन्हें तुम्हारे वश में करें तथा अग्नि इन्हें उपयोगी बनावें. (२)
पुनरेता नि वर्तन्तामस्मिन्पुष्यन्तु गोपतौ. इहैवाग्ने नि धारयेह तिष्ठतु या रयिः.. (३)
ये गाएं बार-बार लौटकर मेरे पास आवें एवं मुझ गोपाल के पास आकर पुष्ट हों. हे
अग्नि! इन गायों को मेरे पास ही रखो. यह गायरूप धन मेरे पास ही रहे. (३)
यन्नियानं न्ययनं संज्ञानं यत्परायणम्. आवर्तनं निवर्तनं यो गोपा अपि तं हुवे.. (४)
मैं प्रार्थना करता हूं कि मुझे गायों से भरी हुई गोशाला प्राप्त हो. गाएं मेरे घर आवें. मैं
गायों को पहचानूं व गायों को चराने जाऊं. गाएं मेरे घर से वन में जावें और चरने के बाद
वापस लौटें. मैं गाय पालने वालों की भी प्रार्थना करता हूं. (४)
य उदानड् व्ययनं य उदानट् परायणम्. आवर्तनं निवर्तनमपि गोपा नि वर्तताम्.. (५)
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