ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1582 of 1855
Read in contextदो. (९)
आपो अस्मान्मातरः शुन्धयन्तु घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु.
विश्वं हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरुदिदाभ्यः शुचिरा पूत एमि.. (१०)
मातारूप जल हमें शुद्ध करे, घृत के समान बहने वाला जल हमें शुद्ध करे एवं दिव्य
जल हमारे समस्त पापों को बहाकर ले जावे. हम शुद्ध और पवित्र होकर जल से बाहर आते
हैं. (१०)
द्रप्सश्चस्कन्द प्रथमाँ अनु द्यूनिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः.
समानं योनिमनु सञ्चरन्तं द्रप्सं जुहोम्यनु सप्त होत्राः.. (११)
निचुड़ता हुआ सोमरस पार्थिव एवं द्युलोक को लक्ष्य करके बहता है. हम सात होता
इस स्थान पर और इसके आधार पूर्व स्थान पर विचरण करने वाले सोम का हवन करते हैं.
(११)
यस्ते द्रप्सः स्कन्दति यस्ते अंशुर्बाहुच्युतो धिषणाया उपस्थात्.
अध्वर्योर्वा परि वा यः पवित्रात्तं ते जुहोमि मनसा वषट्कृतम्.. (१२)
हे सोम! तुम्हारा जो रस टपकता है, तुम्हारा जो लता भाग पुरोहित के हाथ से रस
निचोड़ने वाले पत्थरों के ऊपर स्थित है तथा जो भाग दशापवित्र के ऊपर रखा हुआ है, हम
मन से उन सबको नमस्कार करते हुए हवन करते हैं. (१२)
यस्ते द्रप्सः स्कन्नो यस्ते अंशुरवश्च यः परः सुचा.
अयं देवो बृहस्पतिः सं तं सिञ्चतु राधसे.. (१३)
हे सोम! तुम्हारा जो रस बाहर आ गया है अथवा तुम्हारा जो लता भाग सुच के नीचे
गिर गया है, हमें धन देने के लिए बृहस्पति देव उन दोनों को जल से मिलावें. (१३)
पयस्वतीरोषधयः पयस्वन्मामकं वचः.
अपां पयस्वदित्पयस्तेन मा सह शुन्धत.. (१४)
हे जल! वनस्पतियां दूध के समान रस से भरी हुई हैं. हमारा स्तुतिवचन भी दूध के
समान रस से भरा है. तुम्हारा जो सार अंश दूध के समान है, उससे तुम हमें शुद्ध करो. (१४)
सूक्त—१८ देवता—मृत्यु आदि
परं मृत्यो अनु परेहि पन्थां यस्ते स्व इतरो देवयानात्.
चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान्.. (१)
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