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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1570 of 1855

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Page 1570

हे बलपुत्र अग्नि! जो मनुष्य तुम्हारी दयादृष्टि चाहता है, वह प्रसिद्ध, अन्नदाता, घोड़ों
पर बैठकर चलने वाला, दीप्तिशाली, बली एवं प्रतिदिन सुशोभित होता हुआ तुम्हारी सेवा
करता है. (७)
यदग्न एषा समितिर्भवाति देवी देवेषु यजता यजत्र.
रत्ना च यद्विभजासि स्वधावो भागं नो अत्र वसुमन्तं वीतात्.. (८)
हे यज्ञ-योग्य अग्नि! जब हमारी स्तुतियां देवों के बीच में प्रकाशित होती हैं, उस समय
तुम हमें रत्न देते हो. हे स्वधायुक्त अग्नि! उस समय हम धन का भाग प्राप्त करें. (८)
श्रुधी नो अग्ने सदने सधस्थे युक्ष्वा रथममृतस्य द्रवित्नुम्.
आ नो वह रोदसी देवपुत्रे माकिर्देवानाम्प भूरिह स्या.. (९)
हे अग्नि! तुम देवों के साथ यज्ञशाला में रहकर हमारे स्तुतिवचनों को सुनो, अमृत
बरसाने वाले रथ को जोड़ो व देवों के माता-पिता द्यावा-पृथिवी को हमारे पास लाओ. तुम
देवों को छोड़कर मत जाओ. तुम यहीं रहो. (९)
सूक्त—१२ देवता—अग्नि
द्यावा हक्षामा प्रथमे ऋतेनाभिश्रावे भवतः सत्यवाचा.
देवो यन्मर्तान्यजथाय कृण्वन्त्सीदद्धोता प्रत्यङ् स्वमसुं यन्.. (१)
सत्य बोलने वाले एवं प्रमुख द्यावा-पृथिवी सबसे पहले यज्ञ में अग्नि का आह्वान करें.
अग्नि देव मानवों को यज्ञ के लिए प्रेरित करते हुए एवं देवों को बुलाने के लिए ज्वलारूपी
प्राणों को धारण करके वेदी पर बैठें. (१)
देवो देवान्परिभूरृतेन वहा नो हव्यं प्रथमश्चिकित्वान्.
धूमकेतुः समिधा भ्राभ्रॅजीको मन्द्रो होता नित्यो वाचा यजीयान्.. (२)
दीप्तिशाली, सभी देवों में प्रमुख, सब कुछ जानने वाले, धुएं रूपी ध्वजा से युक्त,
समिधा के कारण ऊंची ज्वालाओं वाले, स्तुतियोग्य, नित्य एवं वाणी द्वारा यजमानों का यज्ञ
करने वाले अग्नि देवों के समीप जाते हुए यज्ञ के साथ-साथ हमारा हव्य ले जावें. (२)
स्वावृग्देवस्यामृतं यदी गोरतो जातासो धारयन्त उर्वी.
विश्वे देवा अनु तत्ते यजुर्गुर्दुहे यदेनी दिव्यं घृतं वाः.. (३)
अग्नि देव के अपने तेज से जो जल उत्पन्न होता है, उस जल से उत्पन्न होने वाले वृक्ष
द्यावा-पृथिवी को धारण करते हैं तथा सभी देव तुम्हारे दिए हुए जल की प्रशंसा करते हैं.
तुम्हारी उज्ज्वल दीप्ति दिव्य एवं बरसने वाले जल को दुहती है. (३)
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