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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1565 of 1855

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Page 1565

सूक्त—९ देवता—जल
आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन. महे रणाय चक्षसे.. (१)
हे सुख के आधार जल! तुम हमें अन्न पाने के योग्य बनाओ तथा हमें महान् व रमणीय
ज्ञान दो. (१)
यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः. उशतीरिव मातरः.. (२)
हे जल! पुत्र की उन्नति चाहने वाली माताएं जिस प्रकार उसे दूध देती हैं, उसी प्रकार
तुम अपना सुखकर रस हमें दो. (२)
तस्मा अरङ्गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ. आपो जनयथा च नः.. (३)
हे जल! तुम जिस पाप को नष्ट करने के लिए हमसे प्रसन्न हुए हो, हम उसी पाप के
नाश के लिए तुम्हारे पास शीघ्र जाते हैं. तुम हमें प्रजनन के योग्य बनाओ. (३)
शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये. शं योरभि स्रवन्तु नः.. (४)
दिव्य जल हमारे यज्ञ के लिए सुखदाता हों एवं पीने योग्य बनें. जल हमारे ऊपर शुद्धि
हेतु बरसें, हमारे उत्पन्न रोगों को मिटावें तथा अनुत्पन्न रोगों को हमसे अलग रखें. (४)
ईशाना वार्याणां क्षयन्तीश्चर्षणीनाम्. अपो याचामि भेषजम्.. (५)
जल अभिलाषायोग्य वस्तुओं के स्वामी एवं मानवों को निवासस्थान देने वाले हैं. हम
जलों से दवाओं की प्रार्थना करें. (५)
अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा. अग्निं च विश्वशम्भुवम्.. (६)
सोम ने मुझसे कहा कि जल के भीतर सभी दवाएं एवं संसार को सुखी करने वाले
अग्नि रहते हैं. (६)
आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे३ मम. ज्योक्च सूर्यं दृशे.. (७)
हे जल! तुम मेरे शरीर की रक्षा करने वाली दवाओं को पुष्ट करो, जिससे हम बहुत दिन
तक सूर्य को देख सकें. (७)
इदमापः प्र वहत यत्किं च दुरितं मयि. यद्वाह्मभिदुद्रोह यद्वा शेप उतानृतम्.. (८)
हे जल! मुझ में जो कुछ पाप है, मैंने जो द्रोह किया है, मेरा जो पतन हुआ है अथवा
मैंने जो झूठ बोला है, उसे मुझसे दूर करो. (८)
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