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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1552 of 1855

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Page 1552

सत्यमुग्रस्य बृहतः सं स्रवन्ति संस्रवाः.
सं यन्ति रसिनो रसाः पुनानो ब्रह्मणा हर इन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (५)
वास्तविक उग्र और महान् सोम की नीचे गिरने वाली धारा बह रही है. रस वाले सोम
का यह रस बह रहा है. हे हरे रंग के सोम! तुम ब्राह्मण द्वारा शुद्ध होते हुए इंद्र के लिए रस
नीचे गिराओ. (५)
यत्र ब्रह्मा पवमान छन्दस्यां३ वाचं वदन्.
ग्राव्णा सोमे महीयते सोमेनानन्दं जनयन्निन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (६)
हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम्हारे निमित्त सात छंदों के द्वारा बनाई हुई स्तुति को बोलने
वाले, पत्थर की सहायता से तुम्हारा रस निचोड़ते हुए तथा तुम्हारे द्वारा देवों में आनंद उत्पन्न
करने वाले ब्राह्मण की जहां पूजा होती है, तुम वहां इंद्र के लिए रस नीचे गिराओ. (६)
यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मँल्लोके स्वर्हितम्.
तस्मिन्मां धेहि पवमानामृते लोके अक्षित इन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (७)
हे सोम! जिस लोक में नित्य ज्योति है, स्वर्ग छिपा हुआ है, उसी अमर एवं क्षयरहित
लोक में मुझे ले चलो. तुम इंद्र के लिए रस बरसाओ. (७)
यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः.
यत्रामूर्यह्वतीरापस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (८)
हे सोम! जिस लोक में विवस्वान् के पुत्र राजा हैं, जहां स्वर्ग का द्वार है एवं जहां गंगा
आदि विशाल नदियां स्थित हैं, मुझे उसी मरणरहित लोक में ले चलो एवं इंद्र के लिए अपना
रस नीचे गिराओ. (८)
यत्रानुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः.
लोका यत्र ज्योतिष्मन्तस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (९)
हे सोम! स्वर्ग के जिस तीसरे लोक में सूर्य कि किरणें उनकी इच्छा के अनुकूल हैं ओर
जहां ज्योति वाले लोग रहते हैं, उस लोक में पहुंचाकर मुझे अमर बनाओ तथा इंद्र के लिए
अपना रस नीचे गिराओ. (९)
यत्र कामा निकामाश्च यत्र ब्रध्नस्य विष्टपम्.
स्वधा च यत्र तृप्तिश्च तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (१०)
हे सोम! जिस लोक में अभिलषित एवं प्रार्थनीय इंद्रादि देव रहते हैं, जहां सबके ज्ञापक
सूर्य का स्थान है और जहां स्वधा शब्द के साथ दिया गया अन्न एवं तृप्ति है, वहां मुझे अमर
बनाओ तथा इंद्र के लिए अपना रस नीचे गिराओ. (१०)
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