ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1530 of 1855
Read in contextलाओ एवं यजमान के घर में रहकर उसके पृथिवी संबंधी एवं दिव्य धन को पुष्ट करो. (२)
त्वं धियं मनोजुजं सृजा वृष्टिं न तन्यतुः
त्वं वसूनि पार्थिवा दिव्या च सोम पुष्यसि.. (३)
हे सोम! तुम अपने मन के समान वेग वाली सोम की धारा को पात्रों में उसी प्रकार
गिराओ. जिस प्रकार मेघ वर्षा करते हैं. तुम धरती संबंधी एवं दिव्य धनों को बढ़ाते हो. (३)
परि ते जिग्युषो यथा धारा सुतस्य धावति.
रंहमाणा व्य१व्ययं वारं वाजीव सानसिः.. (४)
हे निचुड़े हुए सोम! स्तोताओं द्वारा सेवा योग्य एवं वेग वाली तुम्हारी धारा भेड़ के बालों
से बने दशापवित्र पर इस प्रकार दौड़ती है, जैसे शत्रुंजयी वीर का घोड़ा दौड़ता है. (४)
क्रत्वे दक्षाय नः कवे पवस्व सोम धारया.
इन्द्राय पातवे सुतो मित्राय वरुणाय च.. (५)
हे इंद्र, मित्र और वरुण के पान हेतु निचुड़े हुए तथा क्रांतदर्शी सोम! तुम हमें ज्ञान और
बल देने के लिए धारा के रूप में नीचे गिरो. (५)
पवस्व वाजसातमः पवित्रे धारया सुतः. इन्द्राय सोम विष्णवे देवेभ्यो मधुमत्तमः.. (६)
हे अतिशय अन्नदाता एवं निचुड़े हुए सोम! तुम धारा के रूप में नीचे गिरो एवं इंद्र,
विष्णु आदि देवों के लिए मधुरतम बनो. (६)
त्वां रिहन्ति मातरो हरिं पवित्रे अद्रुहः. वत्सं जातं न धेनवः पवमान विधर्मणि.. (७)
हे पवमान सोम! पैदा हुए बछड़ों को जिस प्रकार गाएं चाटती हैं, उसी प्रकार हव्यधारक
यज्ञ में द्रोहरहित एवं माताओं के समान जल हरे रंग वाले तुमको चाटते हैं. (७)
पवमान महि श्रवश्चित्रेभिर्यासि रश्मिभिः.
शर्धन्तमांसि जिघ्नसे विश्वानि दाशुषो गृहे.. (८)
हे सोम! तुम अपनी नानाविध किरणों के साथ महान् और आश्रययोग्य अंतरिक्ष में जाते
हो. हे वेगशाली सोम! तुम हविदाता यजमान के घर में ठहर कर अंधकाररूपी सभी राक्षसों
को समाप्त करते हो. (८)
त्वं द्यां च महिव्रत पृथिवीं चाति जभ्रिषे. प्रति द्रापिममुञ्चथाः पवमान महित्वना..
(९)
हे महान् कर्म वाले सोम! तुम द्यावा-पृथिवी को ठीक से धारण करते हो. हे पवमान
ebook converter DEMO Watermarks*