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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1524 of 1855

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Page 1524

अंतरिक्ष से धन दो. (४४)
सोमः सुतो धारयात्यो न हित्वा सिन्धुर्न निम्नमभि वाज्यक्षाः.
आ योनिं वन्यमसदत्पुनानः समिन्दुर्गोभिरसरत्समद्भिः.. (४५)
निचुड़े हुए सोम अपनी धारा के द्वारा तीव्रगामी अश्व के समान जाकर रहने वाली नदी
की तरह नीचे द्रोणकलश में गिरते हैं. शुद्ध सोम द्रोणकलश में बैठते हैं एवं गाय के दूध आदि
में मिलाए जाते हैं. (४५)
एष स्य ते पवत इन्द्र सोमश्चमूषू धीर उशते तवस्वान्.
स्वर्चक्षा रथिरः सत्यशुष्मः कामो न यो देवयतामसर्जि.. (४६)
हे कामना करने वाले इंद्र! धीर एवं वेगशाली सोम तुम्हारे लिए चमू नामक पात्रों में
गिरते हैं, सबको देखने वाले, रथयुक्त एवं सच्ची शक्ति वाले सोम देवों की इच्छा करने वाले
यजमानों के लिए अभिलाषापूरक के समान बनाए जाते हैं. (४६)
एष प्रत्नेन वयसा पुनानस्तिरो वर्पांसि दुहितुर्दधानः.
वसानः शर्म त्रिवरूथमप्सु होतेव याति समनेषु रेभन्.. (४७)
प्राचीन अन्न से पवित्र होते हुए, सबका दोहन करने वाली धरती के रूपों को अपने तेज
से ढकते हुए, तीनों ऋतुओं से बचाने वाली यज्ञशाला को ढकते हुए एवं जलों में स्थित सोम
यज्ञों में इस प्रकार शब्द करते हुए जाते हैं, जिस प्रकार स्तोता स्तोत्र बोलता हुआ जाता है.
(४७)
नू नस्त्वं रथिरो देव सोम परि स्रव चम्वोः पूयमानः.
अप्सु स्वादिष्ठो मधुमाँ ऋतावा देवो न यः सविता सत्यमन्मा.. (४८)
हे अभिलाषा करने योग्य एवं रथस्वामी सोम! तुम हमारे यज्ञ में चमू नामक पात्रों में
शुद्ध होते हुए जलों में जल्दी एवं सब ओर से गिरो. स्वादपूर्ण, मधुरता भरे, यज्ञस्वामी एवं
सबके प्रेरक सोम देवता के समान सच्ची स्तुतियों वाले हैं. (४८)
अभि वायुं वीत्यर्षा गृणानोऽभि मित्रावरुणा पूयमानः.
अभि नरं धीजवनं रथेष्ठामभीन्द्रं वृषणं वज्रबाहुम्.. (४९)
हे स्तुत सोम! तुम पान के निमित्त वायु के पास जाओ. तुम शुद्ध होते हुए मित्र व वरुण
के पास जाओ. तुम सबके नेता, मन के समान वेगशाली एवं रथ में बैठे हुए अश्विनीकुमारों के
पास जाओ तथा अभिलाषापूरक एवं वज्रबाहु इंद्र के पास जाओ. (४९)
अभि वस्त्रा सुवसनान्यर्षामि धेनूः सुदुघाः पूयमानः.
अभि चन्द्रा भर्तवे नो हिरण्याभ्यश्वान्रथिनो देव सोम.. (५०)
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