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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1478 of 1855

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Page 1478

स्तोताओं ने पवित्र स्तुतियां बोलते हुए इंद्र के अतिशय प्रिय तेज को नशीले सोमरस की
धाराओं से बढ़ाया है. (२)
पवित्रवन्तः परि वाचमासते पितैषां प्रत्नो अभि रक्षति व्रतम्.
महः समुद्रं वरुणस्तिरो दधे धीरा इच्छेकुर्धरणेष्वारभम्.. (३)
शुद्ध करने की शक्ति से युक्त सोमरस की किरणें माध्यमिका वाक् के चारों ओर बैठती
हैं. इन किरणों के प्राचीन पिता सोम प्रकाशनरूप कर्म की रक्षा करते हैं. अपने तेज से
सबको ढकने वाले सोम अपनी किरणों से अंतरिक्ष को ढकते हैं. धीर ऋत्विज् सबको धारण
करने वाले जल में सोम को मिलाना आरंभ करते हैं. (३)
सहस्रधारेऽव ते समस्वरन्दिवो नाके मधुजिह्वा असश्चतः.
अस्य स्पशो न नि मिषन्ति भूर्णयः पदेपदे पाशिनः सन्ति सेतवः.. (४)
हजार धाराएं बरसाने वाले अंतरिक्ष में वर्तमान सोमरस की किरणें नीचे स्थित धरती को
वृष्टियुक्त करती हैं. द्युलोक के ऊंचे स्थान में स्थित, मधुपूर्ण जीभ वाली एक-दूसरे से अलग
सोमरस की अपनी किरणें तेज चलती हुई कभी पलक नहीं गिरातीं. इस प्रकार सोम की
किरणें स्थान-स्थान पर पापियों को बाधा पहुंचाती हैं. (४)
पितुर्मातुरध्या ये समस्वरन्नृचा शोचन्तः संदहन्तो अव्रतान्.
इन्द्रद्विष्टामप धमन्ति मायया त्वचमसिक्नीं भूमनो दिवस्परि.. (५)
द्यावा-पृथिवीरूपी माता-पिता से अधिक मात्रा में उत्पन्न होने वाली सोम की किरणें
ऋत्विजों की स्तुतियों से दीप्ति होती हुई यज्ञकर्म न करने वालों को नष्ट करती हैं एवं इंद्र से
द्वेष करने वाले व काले चमड़े वाले राक्षसों को अपनी बुद्धि द्वारा धरती एवं आकाश से दूर
भगाती हैं. (५)
प्रत्नान्मानादध्या ये समस्वरञ्छ्लोकयन्त्रासो रभसस्य मन्तवः.
अपानक्षासो बधिरा अहासत ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः.. (६)
स्तुति के अनुसार चलने वाली एवं शीघ्रगति का अभिमान करने वाली सोम की किरणें
प्राचीन अंतरिक्ष से एक साथ उत्पन्न हुई थीं. ज्ञान-दृष्टि से शून्य एवं देवों की स्तुतियां न सुनने
वाले पापी लोग उन किरणों का त्याग कर देते हैं. पापी लोग सत्य के मार्ग से चलकर पार
नहीं पहुंचते. (६)
सहस्रधारे वितते पवित्र आ वाचं पुनन्ति कवयो मनीषिणः.
रुद्रास एषामिषिरासो अद्रुहः स्पशः स्वञ्च सुदृशो नृचक्षसः.. (७)
यज्ञ पूर्ण करने वाले एवं बुद्धिमान् ऋत्विज् अनेक धाराओं वाले, विस्तृत एवं शुद्ध सोम
में स्थित माध्यमिका वाणी की स्तुति करते हैं. गतिशील, स्तोताओं से द्रोह न करने वाले,
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