ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextजाओ तथा ऋत्विजों की प्रेरणा से इंद्र के पेट में पहुंचो. हे विद्वान् सोम! नाविक जैसे नाव
द्वारा लोगों को नदी के पार पहुंचाता है, उसी प्रकार तुम हमें पापों के पार भेजो. तुम शूर के
समान हमारे शत्रुओं को मारो और हमें निंदकों से बचाओ. (१०)
सूक्त—७१ देवता—पवमान सोम
आ दक्षिणा सृज्यते शुष्म्या३सदं वेति द्रुहो रक्षसः पाति जागृविः.
हरिरोपशं कृणुते नभस्पय उपस्तिरे चम्वो ३र्ब्रह्म निर्णिजे.. (१)
सोम-संबंधी यज्ञ में ऋत्विजों को दक्षिणा दी जाती है. शक्तिशाली सोम द्रोणकलश में
प्रवेश करते हैं. जागरणशील सोम अपने स्तोताओं को द्रोही राक्षसों से बचाते हैं. हरे रंग वाले
सोम सबके धारण करने वाले एवं आकाश के तल-जल को बनाते हैं तथा द्यावा-पृथिवी को
ढकने के लिए तथा अंधकार मिटाने के लिए सूर्य को स्थिर करते हैं. (१)
प्र कृष्टिव शूष एति रोरुवदसूर्य१ वर्णं नि रिणीते अस्य तम्.
जहाति वव्रिं पितुरेति निष्कृतमुपप्रुतं कृणुते निर्णिजं तना.. (२)
शब्द करते हुए सोम शत्रुहननकर्त्ता योद्धा के समान जाते हैं एवं अपने असुर बाधक बल
को प्रकट करते हैं. सोम बुढ़ापे का त्याग करते हैं तथा पीने योग्य द्रव्य के रूप में द्रोणकलश
में जाते हैं. सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर अपने गतिशील रूप को ठहराते हैं. (२)
अद्रिभिः सुतः पवते गभस्त्योर्वृषायते नभसा वेपते मती.
स मोदते नसते साधते गिरा नेनिक्ते अप्सु यजते परीमणि.. (३)
पत्थरों और भुजाओं की सहायता से निचोड़े गए सोम पात्रों में जाते हैं एवं बैल के
समान आचरण करते हैं. स्तुतियों से प्रशंसित सोम अंतरिक्ष के साथ सब जगह जाते हैं एवं
प्रसन्न होते हैं. सोम पात्रों में मिलते हैं, स्तुतियां सुनकर स्तोताओं को धन देते हैं, जल में शुद्ध
होते हैं एवं यज्ञ में पूजे जाते हैं. (३)
परि द्युक्षं सहसः पर्वतावृधं मध्वः सिञ्चन्ति हर्म्यस्य सक्षणिम्.
आ यस्मिन्गावः सुहुताद ऊधनि मूर्धञ्छ्रीणन्त्यग्रियं वरीमभिः.. (४)
शक्तिशाली एवं मादक सोम दीप्तिशाली द्युलोक में निवास करने वाले, पर्वतों को बढ़ाने
वाले एवं शत्रुनागरियों को नष्ट करने वाले इंद्र को सींचते हैं. हव्यभक्षण करने वाली गाएं अपने
उठे हुए स्तनों में भरे उत्तम दूध को अपनी महिमा से इंद्र को देती हैं. (४)
समी रथं न भुरिजोरहेषत दश स्वसारो अदितेरुपस्थ आ.
जिगादुप ज्रयति गोरपीच्यं पदं यदस्य मतुथा अजीजनन्.. (५)
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