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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1472 of 1855

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Page 1472

हैं. (९)
इन्दविन्द्राय बृहते पवस्व सुमृळीको अनवद्यो रिशादा:.
भरा चन्द्राणि गृणते वसूनि देवैर्द्यावापृथिवी प्रावतं नः.. (१०)
हे सोम! तुम महान् इंद्र के लिए पवित्र बनो. तुम इंद्र को भली-भांति सुख देने वाले,
निंदारहित एवं बाधकों को हराने वाले हो. तुम मुझ स्तोता को आह्लादक धन दो. द्यावा-
पृथिवी उत्तम धन देकर हमारी रक्षा करें. (१०)
सूक्त—७० देवता—पवमान सोम
त्रिरस्मै सप्त धेनवो दुदुहे सत्यामाशिरं पूर्व्ये व्योमनि.
चत्वार्यन्या भुवनानि निर्णिजे चारूणि चक्रे यदृतैरवर्धत.. (१)
शुद्ध होते हुए सोम के लिए प्राचीन लोगों द्वारा किए गए यज्ञ में इक्कीस गाएं दूध देती
हैं. सोम जब यज्ञों द्वारा बढ़े, तब उन्होंने अपनी शुद्धि के लिए चार शोभन जल बनाए. (१)
स भिक्षमाणो अमृतस्य चारुण उभे द्यावा काव्येना वि शश्रथे.
तेजिष्ठा अपो मंहना परि व्यत यदी देवस्य श्रवसा सदो विदुः.. (२)
जब यजमान यज्ञ करते हुए शोभन जल मांगते हैं, तब सोम धरती-आकाश को जलों से
भर देते हैं. सोम अपनी महिमा द्वारा अतिशय तेजस्वी जलों को ढकते हैं. ऋत्विज् हव्य
धारण करके दीप्तिशाली सोम का स्थान जान गए. (२)
ते अस्य सन्तु केतवोऽमृत्यवोऽदाभ्यासो जनुषी उभे अनु.
येभिर्नृम्णा च देव्या च पुनत आदिद्राजानं मनना अगृभ्णत.. (३)
सोम का ज्ञान कराने वाली, मरणरहित एवं हिंसित न होने वाली किरणें स्थावर-जंगम
दोनों की रक्षा करें. इन्हीं ज्ञापक किरणों द्वारा सोम बल एवं देवयोग्य अन्न देते हैं. निचोड़ने की
क्रिया के बाद ही दीप्तिशाली सोम को उत्तम स्तुतियां मिलती हैं. (३)
स मृज्यमानो दशभिः सुकर्मभिः प्र मध्यमासु मातृषु प्रमे सचा.
व्रतानि पानो अमृतस्य चारुण उभे नृचक्षा अनु पश्यते विशौ.. (४)
सोम शोभन-कर्मों वाली दस उंगलियों द्वारा मसले जाकर लोकों को देखने के लिए
अंतरिक्षस्थित मध्यमा वाक् में रहते हैं. मनुष्यों को देखने वाले सोम कल्याणकारी जल की
वर्षा के लिए यज्ञकर्मों की रक्षा करते हुए अंतरिक्ष से मानवों और देवों दोनों को देखते हैं. (४)
स मर्मृजान इन्द्रियाय धायस ओभे अन्ता रोदसी हर्षते हितः.
वृषा शुष्मेण बाधते वि दुर्मतीरादेदिशानः शर्यहेव शुरुधः.. (५)
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